Sunday, December 7, 2008

पत्रकार महोदय
'इतने मरे'
यह थी सबसे आम, सबसे ख़ास ख़बर
छापी भी जाती थी
सबसे चाव से
जितना खू़न सोखता था
उतना ही भारी होता था
अख़बार।
अब सम्पादक
चूंकि था प्रकाण्ड बुद्धिजीवी
लिहाज़ा अपरिहार्य था
ज़ाहिर करे वह भी अपनी राय।
एक हाथ दोशाले से छिपाता
झबरीली गरदन के बाल
दूसरा रक्त-भरी चिलमची में
सधी हुई छ्प्प-छ्प।
जीवन किन्तु बाहर था
मृत्यु की महानता की उस साठ प्वाइंट काली
चीख़ के बाहर था जीवन
वेगवान नदी सा हहराता
काटता तटबंध
तटबंध जो अगर चट्टान था
तब भी रेत ही था अगर समझ सको तो, महोदय पत्रकार !

वीरेन डंगवाल

Friday, October 17, 2008

जिद्दी रेडियो


पंकज मित्र
दूसरे लोगों के लिए जो आवाज सिर्फ एक ÷खट' की थी, स्वप्नमय बाबू के लिए इसी आवाज भर से यह बता देना आसान था कि यहां पर कैपिटल ÷एच' की जगह स्मॉल ÷एच' टाइप हो गया है और ऑनरेबल कोर्ट ऑफ फलां बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेंगे कि ऑनरेबल का एच स्मॉल से लिखा जाए, हो तो यहां तक सकता है कि इसी गलती पर भन्ना कर बेचारे मुवक्किल की जमानत की अर्जी ही नामंजूर कर दें। इन स्थितियों से बचने के लिए विशेषज्ञता की जरूरत थी और यह विशेषज्ञता वैसे ही नहीं आ गयी थी, बरसों की मेहनत कहिये या तपस्या का फल थी कि कचहरी परिसर में नकलखाना के सामने लम्बे बरामदे पर बैठे सैकड़ों खट् खटा खट् खट् की आवाजों के बीच भी अपनी एक गलत खट् की आवाज को वैसे ही पहचान लेते थे जैसे शास्त्राीय संगीत का कोई पारखी सैकड़ों सुरों की भीड़ में एक गलत सुर को। सैकड़ों हजारों खटाखट की आवाजें जिसे वे ताल कचहरी कहते थे किसी बड़े आर्केस्ट्रा के सम्मिलित संगीत से भी ज्यादा मधुर लगती थीं उन्हें क्योंकि इसी पर टिका था उनके पूरे महीने का संगीत − आटा, चावल, दूध, चीनी, चाय, बच्चों की किचकिची फरमाइशें, फीस...खटाक्‌! विवादी स्वर से उनके सोचने की लय टूटी थी, जरूर चाय छलक कर गिरी होगी टेबल पर जिससे हाथ को बचाते हुए चाय का गिलास अंदाज से उठाना था उन्हें, नहीं तो कुर्ते की आस्तीन चाय में लिसड़ जाने का खतरा था और उन्हें बड़ा लिजलिजा लगता था यह अहसास। हल्की सी खुट् से जोर के खटाक्‌ तक की यह यात्रा कई वर्षों में पूरी हुई थी। चाय का गिलास कभी भी बेआवाज नहीं रख पाती थीं वे। शादी के कुछ दिनों के बाद ही जब इस बात पर ध्यान दिलाया था तो − ÷÷तो क्या हुआ? पोंछ देती हूं। एक दो बूंद ही तो छलकी है।''÷÷नहीं मतलब, क्लायंट्स के कागज पत्तर रहते हैं, चाय गिरी रहेगी तो खराब हो सकते हैं न।''मेज पर के कागज पत्तरों की संख्या जैसे जैसे कम होती गयी उसी अनुपात में यह आवाज खुट् से होकर खट्! और अब तो खटाक्‌! अब तो कागज पत्तर रहता नहीं एक भी। इसी खटाक! की आवाज के साथ ही रेडियो पर सुबह छः पांच का समाचार आने लगता था। सुबह का पहला गर्मागर्म समाचार, गर्मागर्म चाय के साथ − यही विलासिता थी स्वप्नमय बाबू की जो धीरे धीरे जिद में बदलती गयी थी। शुरू शुरू का टोकना भी कब बंद हो गया पता नहीं। जब स्वप्नमय बाबू ने अपने पिता की रोबदाब वाली कहानी पत्नी को सुनायी कि कैसे कप प्लेट बिना पोंछे टे्र में रखने पर कैसे नौकरों पर बरस पड़ते थे वे− ÷÷सी क्लास का रास्कल है सब! कुछ मैनर्स सीखा ही नहीं!'' पत्नी ने सिर्फ एक तिक्त निगाह डाली थी और कहा था− ÷÷हां हाथी चला गया, सिकड़ (जंजीर) रह गया।''उधर समाचारों में अफगानिस्तान पर कार्पेट बमबारी शुरू हो चुकी थी इधर भी− ÷÷कब से बोल रहा है बाबू कि चलिए दिखा देते हैं शंकर नेत्रालय में। अब नया नया चीज आ गया है। ठीक भी तो हो सकता है आंख, लेकिन नहीं... क्या जो मिलता है। अंधा सांप के तरह सम्पत्ति पकड़ के बैठे रहेंगे। जिन्दगी भर जान खाया अभी भी नहीं छोड़ेगा। बस एक रट नहीं जाना है। अरे ! बेटा है, दुश्मन थोड़े है लेकिन जान छोड़ दिया तो आदमी क्या...।''÷÷तुमको बेटा के साथ जाके घूमने फिरने का शौक है तो जाओ न, हम मना थोड़े किये हैं, गयी तो थी दार्जीलिंग लौट काहे आयी चार दिन में?''÷÷नहीं आते तो कौन देता रोटी बेल के, तीन जगह तो जला लिये हाथ, सूझता है नहीं। जिद कि अकेले रह लेंगे! जिनगी नरक कर दिया।''ए क्विक ब्राउन फॉक्स जम्प्स ओवर द लेजी डॉग− किसी जमाने में टाइपिंग इंस्टीच्ट्यूट में सिखाया गया यह जुमला याद आया उनको। इसी एक लाइन में ए से जेड तक पूरी वर्णमाला समा जाती थी। तब पता नहीं लेजी डॉग क्या करता होगा। क्याऊं क्याऊं करके चुप हो जाता होगा या मुकाबला करता होगा। उसका पाला अगर रोज क्विक ब्राउन फॉक्स से पड़े तो क्या संकल्पशक्ति बरकरार रख पायेगा वह। तभी रेडियो पर ÷आज का चिन्तन' आने लगा था − ÷संकल्प की शक्ति'− ÷मनुष्य के पास जो सबसे बड़ी शक्ति है वह है संकल्प, दृढ़संकल्प एवं अटूट आत्मविश्वास के साथ...' खट्, खट्, खटाक, खट्, खटाक, टिंग... पूरी सृष्टि को इसी संगीत से भर देने की इच्छा होती थी। बला की तेजी और अंगे्रजी का अच्छा ज्ञान− कामयाब टाइपिस्टों में शुमार था उनका − जज, मजिस्ट्रेट ने कितनी भी कठिन शब्दावली में आदेश क्यों न पारित किया हो। कौन? स्वप्नमय बाबू? वहां बैठते हैं, नकलखाना के बरामदा पर बायें से चौथे नम्बर पर। रेमिंग्टन की मशीन होगी। सामने के बाल थोड़े झड़ गये हैं... लम्बी नाक, पांच बजते ही उठ जायेंगे। कागजों को समेट कर फाइल में और टाइपमशीन को काठ के बक्से में डाल कर हरक्यूलिस साईकिल के कैरियर पर − खास तरीके का बनवाया है। प्लास्टिक के एक थैले में फाइलें ले जायेंगे घर पर कर लेंगे − सुबह मिल जायेगा आपको...सब्जी वगैरह खरीदते हुए चार किलोमीटर साइकिल चला कर पहुंच जायेंगे शहर के एकदम किनारे गंगातट पर बने पुश्तैनी पुराने मकान में...सब्जी के परिमाण एवं गुणवत्ता से ही आंक लेगी पत्नी आज की कमाई− ÷÷अभी कटहल तो महंगा मिला होगा। अरे! सहजन भी आ गया बाजार में।'' बच्चों की पढ़ाई वढ़ाई हो रही होगी कम धौलधप्पा ज्यादा − बिजली भी कहां रहती है? लालटेन में कितना आंख फोड़ेंगे। फिर तुलनात्मक रूप से तेज रोशनी वाली लालटेन तो उन्हें चाहिए − खट् खट् खटाक खुट खटाक टिंग... खेतीबारी का कार्यक्रम आ रहा है रेडियो पर − फली छेदक कीड़े का उपचार− ÷पौधों में फली लगते ही ये छेदक कीड़े उसमें छेद करने लगते हैं। पूरी जीवनीशक्ति ही चूस लेते हैं। इनके उपचार के लिए...'आज सी.जे.एम. साहब को उनका पेशकार डांट रहा था चेम्बर के पास बने रेस्टरूम में− ÷÷ऐसे कैसे चलेगा? बचवन का फीस, राशन सब्जी− मेरा नही आपका। कहां से बेवस्था होगा? सबका बेल रिजेक्ट कर दीजियेगा तो?'' जब्बर सी.जे.एम. के चेहरे पर फली छेदक कीट लग गया था। जैसे पत्तियां भंगुरा जाती हैं न उसी तरह। पिता जी बताते थे एक जमाना था जब सी.जे.एम. या ए.डी.जे. के सामने खड़े होने में बड़े बड़े पुलिस कप्तानों की घिग्घी बंध जाती थी। घिग्घी तो उनकी भी बंधी हुई थी पता नहीं क्यों सी.जे.एम. ने उन्हें तलब किया था। इंतजार में खड़े थे रेस्टरूम के सामने, तभी पेशकार तीता चेहरा बनाये निकला − ÷÷जाइये, साहब बुला रहें है क्या गड़बड़ किये हैं आर्डरशीट में?''− व्यंग्यपूर्ण मुस्कान!÷÷आप ही किये हैं टाइप?'' वह शेर की मांद में थे ऐन शेर के सामने और शेर का चेहरा बिल्कुल तना था। भंगुराहट गायब थी। फली छेदक कीट का उपचार हो चुका था।÷÷ज्जी''÷÷कितना दिन नौकरी है?''÷÷जी आठ साल।''÷÷वालंटरी रिटायरमेण्ट ले लीजिये।''÷÷ज्जी?''÷÷आप अंगे्रजी सिखायेंगे हमको? स्पेलिंग सुधारने की हिम्मत कैसे हुई?'' शेर की दहाड़..÷÷जी, वो ट्रेसपासिंग में डबल एस...''÷÷स्लिप ऑफ पेन नही होता है, इसका प्रचार करने की क्या जरूरत थी?''÷÷जी हमने नहीं...''÷÷ज्यादा होशियार मत बनिये, गेट आउट!'' शेर ने सिर्फ घायल करके छोड़ दिया था। वह भंगुराये चेहरे के साथ बाहर आये। टाइपिंग स्पीड साठ से चालीस हो गयी थी। उस रात विविध भारती के छायागीत कार्यक्रम में अहमद वसी ने गम शीर्षक से गीत बनाये थे−÷चले भी आओ कि बड़ी उदास है रात'। अहमद वसी की उदास मखमली आवाज और गमगीन करते गाने− उसकी पलकों से आंसू का एक कतरा फिसल कर गिरा जिसकी आवाज सुनी थी उन्होंने। वैसे भी जब आंखों की रोशनी धीरे धीरे कम होती जा रही हो तो अनसुनी आवाजें भी सुनाई देने लगती हैं।इट्स इलेवन फिफ्टीन− सिरहाने रखी टॉकिंग क्लॉक का बटन टटोल कर दबाते ही आवाज आयी। अपने कमरे में बिछावन पर बैठे बैठे जब बोर हो जाते हैं स्वप्नमय बाबू तो बातचीत होती है टॉकिंग क्लॉक से। रेडियो जब तक बजता रहता है तो समय का अंदाजा होता रहता है। लेकिन दस बजे दिन से बारह बजे तक बड़ी मुश्किल हो जाती थी। किसी आती जाती आहट को पकड़ कर दाग देते हैं सवाल− ÷÷कितना बजा है?'' अड़ोस पड़ोस का कोई बच्चा हुआ तो बता भी देता है और अगर वे हुईं तो साथ साथ कुछ सुभाषित भी− ÷÷हुंह! कोन ऑफिस जाना है? बैठे बैठे कितना बजा है? एक आदमी खड़ा रहेगा इनको बताने, ग्यारह बजा है।'' अब किसी आदमी का खड़ा रहना तो मुश्किल ही था और बीच में झपकी आ गयी तो समय की डोर हाथ से छूट कर ÷भक्काटा'। कब हो गयी ÷भक्काटा' पता ही नहीं चला। बाबू उस समय आठ नौ साल का रहा होगा। डोर पकड़ कर वह बचपन को जिन्दा कर रहे थे। गंगा के ऊपर उड़ती जा रही थी पतंग, तभी रामेश्वर बाबू के बेटे ने बगल वाली छत से कब पेंच लड़ा दी देख ही नहीं पाये। बाबू जब तक − खीचिये, खीचिये अरे, धत्‌ तेरी − भक्काटा हो गया न! रुआंसा हो गया था बाबू − ÷÷दिखा नही आपको?''− हां दिखा तो नहीं। − एकदम नहीं? न!! दूसरे ही दिन आंखों के डॉक्टर को दिखाते हुए आये और एक भयानक सत्य को दबाये हुए आये दिल में − ÷÷आपके खानदान में किसी को ग्लूकॉमा भी था?''÷÷हां! मां को था मेरी।''÷÷ओह!'' डॉक्टर ने सिर्फ अफसोस व्यक्त किया था। फिर तो आवाजों पर ही निर्भरता बढ़ती गयी थी उनकी। टाइप के अक्षर धुंधले होते जा रहे थे। फाइल पढ़ना तक मुश्किल होता जा रहा था। पत्नी ने कुछ दिन पढ़ने की कोशिश की, उकता कर छोड़ दिया− ÷÷सारा दिन खटो, खाना बनाओ, कपड़ा धोओ, बरतन बाशन, झाड़ू पोछा, फिर रात को आंख फोड़ो। हमसे नहीं होगा।''÷÷लाइये हम पढ़ दें।'' रामेश्वर बाबू का बड़ा बेटा कहता था। एक दीवार के आरपार आवाजें तो आवाजाही करती ही हैं बेरोकटोक। लड़का जहीन था। ठीक पढ़ता था, जहां नहीं पढ़ पाता था स्वप्नमय बाबू अंदाज से ठीक करवा देते थे − खट् खटा खट् खुट् टिंग... पर जैसे ही पौने नौ बजे न्यूजरीडर की आवाज गूंजी कि लगा देता था पूर्णविराम− ÷÷रुकिये काका! न्यूज सुन लें जरा।'' और खेलों का समाचार आते आते आवाज आ जाती थी दीवार के उस पार से− ÷÷मंटू आ जाओ!'' समाचार के सिग्नेचर ट्यून पर लहराते हुए मंटू बाबू अपने घर और उनकी उंगलियां टाइपराइटर के की बोर्ड पर ही रखी रह जातीं।खटाक्‌! थाली टेबल पर आ गिरती थी तब तक, हड़बड़ा कर फाइलें समेटते थे वे। कहीं पानी वानी छलक कर गिरा तो मुवक्किल दुर्गति कर देंगे− दुर्गति तो हो गयी थी तब तक− आज भी वही कद्दू की सब्जी और रोटी थी। लेकिन कुछ कहना मतलब − ÷÷नहीं तो कौन सा मीट मछली लाके धर दिये हैं जो पका दें। जो रहेगा वही न!''÷÷फिर भी, यही कद्दू का सब्जी वहां भाभी बनाती हैं तो...।''÷÷हां! तो जाइये न वहीं खा आइये। बेटा तो मार खा के आया ही है चप्पल से। आप भी जाइये, हुंह! भाई और भाभी।'' जहर उगलने के लिए किसी प्रशिक्षण की जरूरत नहीं− सोचते हैं स्वप्नमय बाबू। फरमाइशी गानों के प्रोग्राम में ÷चुरा लिया है तुमने जो दिल को' गीत की फरमाइश थी और आशा भोंसले की चुलबुली आवाज कमरे में फुदक रही थी, पर स्वप्नमय बाबू तो आशा भोंसले की गायन प्रतिभा की मौलिकता की जगह बेटे की उस मौलिक प्रतिभा को याद कर रहे थे जब...÷÷रंजू! घड़ी कहां है मेरी?'' भैया कचहरी जाने के लिए तैयार थे।÷÷क्या पता! आप ही रखे होंगे कहीं।'' भाभी व्यस्त थीं।÷÷यहीं तो रखे थे, अच्छा खोजना, यहीं होगी कहीं।''÷÷बाबू कहां गया है?'' स्वप्नमय बाबू ने पूछा था पत्नी से।÷÷दोस्त लोग के साथ सिनेमा गया है।''÷÷यहां कौन दोस्त मिल गया इतना जल्दी, और पैसा? तुमने ...।''÷÷नहीं कह रहा था कि दोस्त लोग ही ले जा रहा है।'' दो घंटे के अंदर ही भैया वापस आये थे कॉलर से बाबू को पकड़े। उनका दंतकथा क्रोध प्रसिद्ध था। रास्ते से ही चप्पलों से पीटते ला रहे थे− ÷÷बोल! करेगा फिर? इसी उमर से...ओफ!''÷÷छोड़िये छोड़िये किया क्या है इसने।'' भाभी ने बीचबचाव किया। ÷÷क्या किया है? भोलवा पाकिटमार के साथ जाके घड़ी बेच आया है हिन्दुस्तान वॉच में। भोलवा दोस्त हो गया इसका। वो तो हिन्दुस्तान वॉच वाला घड़ी पहचानता था। भोलवा को सिपाही लोग का लात पड़ा तो गलगला के उगल दिया सब बात। अब शरम के मारे क्या बोलते हम− इ पापी! माथा नीचा कर दिया।''गुस्से की एक तेज लहर स्वप्नमय बाबू के दिमाग में भी उठी और चप्पल उठा कर दौड़े...÷÷छोड़िये न! बच्चा है, गलती हो गया मारिये दीजियेगा क्या?'' पत्नी ने प्रतिभाशाली पुत्र को छत्र छाया में ले लिया था साथ ही जहर की एक तेज पिचकारी − ÷÷घर का बड़ा लोग से ही सीखा है।'' दूसरे कमरे से अदृश्य दिशा में छोड़ी गयी पिचकारी खदबदा कर भैया भाभी के कानों में भी पड़ी।÷÷क्या बोल रही हो, होश है कुछ?''÷÷हां! खूब है, क्या गलत बोले?''भाभी के जोर से रोने की आवाज आयी तो स्वप्नमय बाबू ने उछल कर ढूंढ कर (शाम हो रही थी और कम दिख रहा था उन्हें) गला पकड़ लिया पत्नी का − ÷÷साली! टेंटुए दबा देंगे। अंटशंट बोले जा रही है।''शायद यही एकमात्र अवसर था जब लेजी डॉग ने पौरुष प्रदर्शन करते हुए क्विक ब्राउन फॉक्स को दबोच लिया था। भाभी ने रोते हुए आकर छुड़ाया था और कहा था...÷÷हम लोग का समय ही खराब चल रहा है तो सुनना ही पड़ेगा। समय खराब होने से तो हाथी के उपर बैठे आदमी को भी कुत्ता काट लेता है। सबको पढ़ा लिखा के आदमी बना दिये तो कमा खा रहा है सब। किसी से मांगने गये कुछ?''÷समय खराब' का निहितार्थ था भैया का सस्पेंशन जो उन पर लादा गया था दंतकथा क्रोध के कारण झूठे गबन का मामला बना कर। सुबह ही सपरिवार प्रस्थान कर गये स्वप्नमय बाबू।कितने खुश होकर बेटे के जनम की खुशी की मिठाई खिलायी थी घोष दा को... घोष दा ने कहा था अपने इसी अंदाज में − ÷÷अरे वाहवा बाजी मात कर दिया स्वपन! यही दो ठो मेशीन तो पूरा हिन्दुस्तान में फस्सकिलास काम कर रहा है − एक रेमिंग्टन का टाइपराइटर और दूसरा इ बच्चा पैदा करने का मेशीन।'' फिर लीला भाभी को आवाज दी− ÷÷ओगो शुन छो! स्वपनेर छेले होय छे। वंशेर उद्धारक एसेछे। गोरोम गोरोम चा करो।'' (सुनती हो, स्वप्न के लड़का हुआ है, वंश का उद्धारक आया है, गरमागरम चाय बनाओ तो)। हरदम चाय पीने का कोई नया बहाना चाहिए होता था घोष दा को। घोषबाड़ी की प्रतिष्ठा थी मुहल्ले में एक जमाने में लेकिन अब... वही पत्नी जिसे कहती है न अपने अंदाज में− हाथी चला गया था सिकड़ (जंजीर) रह गया था। पर घोष दा अलमस्त जीव, वही जंजीर बजाते घूमते थे मस्ती में। हाथों में हुनर था। चुटकी बजाते ही रेडियो, घड़ी, बिजली का सामान सब ठीक... और टाइपराइटर के तो विशेषज्ञ ही थे। शहर के दूसरे छोर से भी लोग लादे पहुंचते − मोहल्ले के बच्चों के प्रिय घोष काकू जब तब रेलगाड़ी का इंजन बन बच्चों की कतार बनाये अशोक कुमार के प्रसिद्ध ÷रेलगाड़ी छुक छुक' गाते हुए बगान में घूमते। लीला भाभी हंस कर कहती − ÷बूड़ोर भीमरति होयेछे' (बूढे+ का दिमाग फिर गया है)। रेलगाड़ी में हरदम बाबू गार्ड बनने की जिद करता क्योंकि सीटी बजाने को मिलती थी और घोष दा हो हो करके हंसते हुए उसे गार्ड नियुक्त कर लेते। स्वपन बाबू को तो पहले से ही रेडियो सखा बना रखा था− कि हे रेडियो सखा! काल सुना सचिन देव बर्मन का गाना, सचिन दा का जवाब नहीं, बोलो?÷÷घोष दा! बड़ी चिन्ता में हूं।''÷÷क्यों, क्या हुआ?'' घोष दा गुनगुनाते हुए ट्रांजिस्टर की मरम्मत कर रहे थे।÷÷बाबू फिर फेल हो गया मैथ्स और इंगलिश में।''÷÷अरे हम तो केतना बार बोला हमारा पास भेजो हम पढ़ायेगा उसको। कार्तिक घोष का पढ़ाया लड़का कभी फेल नहीं होता। टेन उद्धार कर लेगा।'' कर भी लिया उद्धार उसने। खटाक्‌ की आवाज के साथ पंडित भीमसेन जोशी की सात पुश्तों का उद्धार कर दिया पत्नी ने − ÷÷रात में भी आदमी जरा चैन से सोयेगा सो नहीं। पें... पें...। बाबू ले जा रेडियो अपना रूम में....'' बाबू जो पढ़ाई के मूकाभिनय में व्यस्त था अब संगीत के बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ पढ़ने का अभिनय करने लगा फलां ÷एफ.एम. हिल्ला के रख दे' के साथ...और जब बी.ए. में एक दो असफल प्रयासों के बाद अंतिम रूप से घोषणा कर दी बाबू ने कि पढ़ाई वढ़ाई से साला कुछ नहीं होता, असल बात है पैसा कमाना − बालीवुडीय शब्दावली में कहा था−÷रोकड़ा होना मांगता समझा क्या?' तो उसकी मां ने एकदम समझा और इस बात की जोरदार शब्दों में वकालत भी की− ÷÷पढ़ लिख के दो चार हजार रुपल्ली के नौकरी से क्या होगा। ठीक ही तो कह रहा है बाबू, आखिर बाबू के बाप ने जिन्दगी में खटाखट की नौकरी कर पाया क्या? कौन सा कद्दू में तीर मार लिया। दोस्तों के साथ पार्टनरशिप में बिजनेस में उतर रहा है तो क्या बुरा है? कल को छोटू कहीं इंजीनियरिंग में कम्पीट कर गया तो औकात है ÷खटाखट बाबू' की उसको पढ़ाने की?'' ऐसे ही पलों में स्वप्नमय बाबू इतना अकेलापन महसूस करने लगते कि बतियाने लगते थे रेडियो से और टॉकिंग क्लॉक से−÷÷इट्स इलेवन पी.एम., ठीक तो कहती है मैडम।''÷÷तुम भी!''÷÷हां तो, तुम्हारी जो तनख्वाह है उसमें तो मेरी मरम्मत तक नहीं करवा पाते हो। घोष दा के पास पहुंच जाते हो फ्रीफंड का...''÷÷पहले तो टाइप करके कुछ एक्स्ट्रा भी... अब तो बत्ती भी गुल हो रही है तो करो बत्ती गुल और सो जाओ।''÷÷अरे अंधे को बत्ती गुल करने को कहती हो मूर्ख घड़ी।''÷÷शटअप! इट्स ट्वेल्व।''इसी बीच बाबू के कमरे से तेज आवाज में टी.वी. चलने की आवाज आने लगती है−÷इट्स टाइम टू डिस्को'। पत्नी ने बताया था कल मुहल्ले में − सबसे बड़ा है और सबसे रंगीन। पहली कमाई से खरीदा है बाबू ने − ÷÷पूरे बीस हजार का है। जिन्दगी में कभी खरीद पाते तुम। जब आंख थोड़ी ठीक भी थी तो रामायण के समय पहुंच जाते थे घोष बाबू के घर। अब तो खैर... जा रही हूं पकौड़ी तलने बाबू के बिजनेस पार्टनर लोग आये हैं...''हुंह! बिजनेस पार्टनर!− पार्टनर लोगों की आवाजें लहक लहक कर उनके कुढ़ते कानों तक पहुंच रही थीं। ÷÷क्या आंटी! इतना टैलेण्ट है आप में, हम लोग तो जानते ही नहीं थे।''÷÷कितना बढ़िया कामेडी कर लेती हैं।''आंटी फूल फूल जा रही थीं। किसी कॉमेडी शो की फूहड़ नकल से बेटे के बिजनेस पार्टनर्स को हंसा रही थीं और पहली बार उनके इस रूप के श्रवण किये थे उन्होंने क्योंकि दर्शन तो सम्भव नहीं था उनके लिए...÷÷अरे, तो पुराने जमाने की मैट्रिक है मम्मी। जब मोहल्ले टोले में एकाध आदमी ही मैट्रिक पास करता था। वो तो ऐसी जगह शादी हो गयी कि...'' यह मम्मी की प्रतिभा पर मुग्ध बाबू था − ÷÷तो रात में मीटिंग है न? मिलते है वहीं।'' पता नहीं कौन सा बिजनेस था कि हमेशा रात में ही मीटिंग रहती थी.... चार पांच बाइक्स के कोरस ने चौंकाया था−÷÷और कल ही तो करना है न सामाजिक काम।'' बाबू के इस जुमले पर सबने ठहाका लगाया था जोर का।÷÷तुम्हारा लेड़का तो सामाजिक टाइप का है स्वपन। अब हमारा चिन्ता नहीं है।'' घोष दा की कुछ दिनों पहले की बात... उनकी अकल्पनीय चिन्ता थी कि जब वह नहीं होंगे तो आसपास के मोहल्ले में जब किसी की मृत्यु होगी तो मृतक की सद्गति.... हंसते हुए कहते थे घोष दा− ÷÷इस फील्ड का सचिन तो हम ही है।''लड़के पूछते−÷÷कितना हो गया काकू स्कोर?''÷÷बाढ़ो साब का मिलाके फोर हंड्रेड नाइंटी फाइव। पांच होने से ही फाइव सेंचुरी।''.... और ये डाबर चौका.... सचिन के बल्ले से निकली गेंद गोली की रफ्तार से बाउंडरी लाइन के बाहर जा रही है। किसी फील्डर के लिये हिलने तक का मौका नहीं और ये चार रन.... इसके साथ ही भारत का स्कोर हो गया.... रेडियो का नॉब घुमाते हुए क्रिकेट की कमेण्ट्री आ रही थी....।किसी भी मृत्यु की सूचना सिर्फ मिल जानी चाहिए घोष दा को। सबसे पहले पहुंच कर कमान थाम लेंगे। घी, पंचकाठ, तिल, लावा.... सामानों की कंठस्थ लिस्ट.... अर्थी अपनी देखरेख में बनवाते घोष दा, हाथ से नाप कर कफन का कपड़ा फाड़ते घोष दा, लकड़ियां सजाते घोष दा, श्मशान के शिबू डोम से मोलभाव करते घोष दा− ÷÷हमारा अपना आदमी था शिबू । बस रख लो। दुख में है आदमी।''शिबू झुंझलाता− ÷÷सब तो आपका अपना ही है घोष बाबू, हमारा भी तो यही कमाई है न।'' लाल आंखों वाला शिबू लुकाठी सुलगा देता था। क्या मजाल कि बिना पूरी तरह फूंके, पानी में दहाये चलें घोष दा− कितनी भी ठंड हो, कितनी भी रात हो जाए गंगा में दो डुबकी लगा कर ही लौटेंगे− लीला भाभी तब तक गरमागरम चाय की कई प्यालियां हाजिर रखेंगी− पहुंचते ही चाहिए होगा उनको।÷÷सीख लो बाबू, सीख लो हमारा रहते। सामाजिक काम है। बहुत पुण्यात्मा लोग को सौभाग्य मिलता है अंतिम समय का साथी बनने का।'' बाबू को एकाध बार उन कार्यों में रुचि लेते देख प्रसन्न थे घोष दा...प्रसन्न थीं पत्नी− घर में सामानों की तादाद बढ़ती देख कर− टी.वी. का गुणगान तो कर ही चुकीं− फ्रिज भी आ चुका था और यह स्वप्नमय बाबू को उससे टकराने पर मालूम हुआ। दरअसल पानी सिरहाने रख दिया जाता था। अब था नहीं तो उठ कर खोजने लगे और धड़ाम से टकरा गये फ्रिज से। पत्नी दूसरे कमरे से आयीं और विषाक्त स्वर में बोलीं कि इतना बड़ा फ्रिज रखा है जरा खोल कर निकाल नहीं सकते थे पानी की बोतल। उनके यह भुनभुनाने पर कि फ्रिज का पानी उनका गला खराब कर देगाा। मजाक उड़ाया गया कि कौन सा इंडियन ऑइडल बनना है उन्हें और सलाह भी दी गयी कि बाबू के पार्टनर लोगों के सामने ऐसी देहाती भुच्च की बात न कह दें।घोष दा के फ्रिज का ठंडा पानी गटागट पीते हुए जब ये वाकया उन्हें सुनाया तो बोले− ÷÷तुम भी अजब जिद्दी हो। अरे! बेटा नया फ्रिज लाया है तो पियो पानी। फ्रिज का पानी कैसे पी रहा है यहां।''÷÷नहीं घोष दा, कुछ ठीक नहीं लग रहा।''÷÷अरे बाबा, तुम्हारा लेड़का उन्नति कर रहा है तो तुमको तो खुशी होना चाहिए। सिरिफ नजर रखेगा कि कुछ उल्टा सीधा काम तो नहीं कर रहा है।''स्वप्नमय बाबू ने खुद को व्यंग्य से मुस्कराते महसूस किया। करीब करीब अंधे हो चुके आदमी को नजर रखने को कह रहे थे घोष दा।रात को बात करनी चाही पत्नी से−÷÷सुनती हो।''÷÷हां! सुनिये तो रहे हैं इतना दिन से।''÷÷बाबू क्या बिजनेस करता है पूछी हो कभी?''÷÷पूछना का है? नजर नहीं आ रहा। आपके तरह थोड़े हैं हम। बैंकवाला लोग रखा है रिकवरी एजेण्ट कि क्या कहता है। ''÷÷काम क्या करना पड़ता है?''÷÷लोन उन लेके जो वापस नहीं करता उससे वापस करवाने का काम है।''÷÷तनख्वाह?''÷÷सब चीज करिये रहा है तो तनखा का पूछें। चुपचाप सुत रहिये। एतना दिन के बाद तो नजर फेरा है भगवान। आपके फेरा में तो जिनगी नरक हो गया था। बाबू बोलता है छोटुआ के पढ़ाई वढ़ाई का चिन्ता नहीं है। इंजीनियरिंग में का कम पैसा लगता है बंगलोर में? करा देगा एडमीशन बोलता है। सुतिये अब। रातों में तो चैन दीजिये। एतना दिन बाद तो रात को नींद आता है ठीक से....। आर ई अपना पिनपिनिया रेडियो बंद कीजिये अब।''दोपहर में भी इसका एक्सटेंशन चला− ÷÷इ देखिए जी, इतना मोटा सिकड़ बना के लाया है सोना का। हम बोले कि अब इ उमर में सोना हम का पहनेंगे जिनगी भर तो दुःख काट लिये, अब तुम्हारी वाइफ आयेगी तो पहनेगी। लेकिन वाह रे बेटा! कहता है जो भी अरमान बचा है पूरा कर लो। पैसा का फिकिर मत करो। घर में भी हाथ लगायेगा अब। टाइल्स लगा के झकाझक करेगा। पुराना तोड़तोड़ के− हां जी मिठाई कौन पूछता है, भोज खिलायेंगे भोज! गृहप्रवेश का। हां जी! तो घर तो नये न होगा।'' इस बार तो पड़ोस की महिलाओं को दी गयी ये गर्वमिश्रित सूचनाएं अपने कमरे में धीमी आवाज में रेडियो सुन रहे उनींदे स्वप्नमय बाबू तक भी पहुंच रही थीं। उन्हें लगा टाकिंग क्लॉक हंसी थी− इट्स थ्री पी.एम.। ठीक से चलना चिकने फर्श पर टाइल्सवाला। अभी तो पुराना घर में अंदाज हो गया है चलने का। रेडियो ने भी सुर मिलाया − ÷चलते चलते मेरे ये गीत याद रखना' − फरमाइशी गीत के कार्यक्रम का आखिरी गीत बज रहा था। खटाक्‌! की आवाज के साथ चाय का प्याला आ चुका था। साथ ही कई बाइक्स भी रुके थे घर्र घर्र... टीं टीं पीं पीं की ध्वनियों से गुंजायमान हो चुका था मोहल्ला। पत्नी की खुशी भरी व्यस्तता छलक छलक पड़ने लगी.... बीच बीच में बाबू उसे बाइक पर पीछे बिठा कर बाजार ले जाता था छोटीमोटी खरीदारी करने। बहुत ही उत्साहित रहती थी तब वह। फुर्र फुर्र हवा में उड़ रही हो जैसे एक रंगीन चिड़िया की तरह− शायद हल्का मेकअप वगैरह भी करती हो भला क्या पता... घर्र घर्र करते हुए बाइक पर बैठने के पहले प्रस्ताव को ही ठुकरा दिया था स्वप्नमय बाबू ने, जब हर पहली तारीख को पेंशन का थोड़ा सा रुपया निकालने वह बैंक जाया करते थे, पूरे समारोहपूर्वक। पहले रामेश्वर बाबू के बेटे की खोज करते फिर मोहल्ले के रिक्शेवाले जागेसर की। फिर चलती थी सवारी तकरीबन चार किलोमीटर की यात्रा पर। पत्नी ने प्रस्ताव रखा−÷÷कहां इतना झमेला करते हैं। बाबू के साथ बाइक पर चले जाइये। दस मिनट में काम हो जाएगा।'' ठोस से ÷नहीं' के बाद − ÷÷हां! पूरा मोहल्ला जब तक जानेगा नहीं कि खटाखट बाबू आज पेंशन का कुछ हजार रुपल्ली उठाने जा रहे हैं। तब तक...'' उनकी तबियत होती कि कहें− ÷इसी कुछ रुपल्ली पर जिन्दा थे अब तक' लेकिन फिर ÷ए क्विक ब्राउन फॉक्स'...घोष दा ने भी कहा था− ÷÷बेकार का जिद है तुम्हारा, बाइक पर घर्र से चले जाओ।''कुमार गंधर्व की आवाज रह रह कर पछाड़ खा रही थी। ऐंठ ऐंठ कर लपक लपक कर बढ़+ती फिर पछाड़ खाकर गिर जाती थी− ÷साधो देखो जग बैराना'।÷÷एकदम पागोल हो गया तुम। हजारों हजार कमा रहा है तुम्हारा लेड़का? सब छोड़के इ पुराना जमाना का रेडियो, टाइपराइटर मरम्मत का काम सीखके क्या करेगा? अरे, अब तो मोबाइल, कम्प्यूटर का जमाना है।'' घोष दा भड़क उठे थे। फिर मुलायमियत से बोले − ÷÷जानता है स्वपन हम खुद ही कुछ दिन से सीरियसली सोच रहा है, लोन लेके दो तीन कम्प्यूटर खरीदेगा। आर मोहल्ला का लेड़का लोग को सिखायेगा। अरे, फ्री में नहीं, नॉमिनल फीस पर। हां एकदम जो गरीब है उसका....''लीला भाभी तब तक कूद गयीं− ÷÷सबका ठेका ले लिया है तुम्हारा घोष दा। रात रात भर सोता नहीं टेंशन में रहता है। बोलता है लेड़का लोग नष्ट हो रहा है। सबको लाइन पर लाना है। जब से गंगापुल बना तब से मोहल्ला खाराप हो गिया।'' ÷÷ओह लीला!'' घोष दा ने रोका − लीला भाभी रुकने वालों में नहीं थी− ÷÷एक महीना से जिद, लोन लेके कम्प्यूटर खरीदेगा। इंस्टीट्यूट खोलेगा। हम बोला काहे झूठ झामेला करता है। लोन चुकेगा कैसे। अभी से तो बैंकवाला दौड़ा दौड़ा के परेशान कर दिया। कौन कौन छोकरा लोग आता है कभी इ कागज कभी उ कागज, क्या जरूरत है आराम से रहो ना बाबू। एक बार माइल्ड अटैक हो चुका है। क्या गलत बोला, बोलो?''स्वप्नमय बाबू भला क्या बोलते? बोले घोष दा ही हंसते हुए − ÷÷उ सब बात नहीं है, बैंक वाला तैयार है, बोला कुछ मोर्टगेज करना होगा। हम बोला− मोर्टगेज के लिए घर ठो है तो, इसी से तुम्हारा भाभी ज्यादा परेशान है। बोलता है घोषबाड़ी का इज्जत चला जाएगा। बोलो तुम आदमी का इज्जत होता है कि घर का− हो हो बूझे ना लीला किछुई....'' (नहीं समझती है लीला कुछ भी)लीला भाभी ने तो तब बूझा जब चुपके से घोष दा कम्प्यूटर के विशेषज्ञ हो गये, लोन लेकर कई कम्प्यूटर भी ले आये और मोहल्ले वालों ने तब जाना जब ÷घोषबाड़ि' की पुरानी इबारत पर झकाझक साइनबोर्ड लग गया− लीला कम्प्यूटर सेण्टर। घोष दा ने कॉलर उंचा कर पत्नी की तरफ देखते हुए पूछा था− ÷÷बोलो तो लीला, केमन लागछे?'' (कैसा लग रहा है) हेमंत कुमार के बंगला गाने की एक धुन गुनगुनाते हुए उनकी तरफ रोमांटिक नजरों से देखने भी लगे थे।÷÷दुत्‌! बूड़ो वयसे भीमरति (बुढ़ापे में मति मारी गयी है)।'' लीला भाभी ने कहा था और रेडियो की टाइमिंग देखिये कि इसी रात विविध भारती ने हेमंत कुमार का वह गीत भी बजाया− ÷जरा नजरों से कह दो जी निशाना चूक ना जाए'।पर चूक गया था घोष दा का निशाना। कहां कहां से कम्प्यूटर सीखने वाले छात्रों को पकड़ पकड़ के लाते। अच्छी तरह सिखाते भी, सस्ते के चक्कर में कुछ आये भी पर घोष दा नीट, एप्टेक थोड़े ही हो जाते। धीरे धीरे शिबू डोम का बेटा, मुसहर टोली, भुइयांटोली के लड़के रह गये और घोष दा तो किसी के चाचा, किसी के दादा ठहरे। तीसरे ही महीने से इएमआई का दैत्य घोष दा के पीछे पड़ गया। घोष दा भागते जाते पसीने पसीने होकर हांफते हांफते, इएमआई का दैत्य पीछे पीछे। साथ में बाइक्स का हॉरर म्यूजिक। घोष दा रेडियो भी लगाते तो उसमें घर्र घर्र सुनाई पड़ता। कई दिनों के बाद स्वप्नमय बाबू जब एक शाम घोष दा के घर पहुंचे किसी बच्चे का हाथ पकड़े जैसा कि तकरीबन हर शाम को करते थे वे− तो घोष दा सिर मुंह लपेटे लेटे हैं। लीला भाभी ने बताया− ÷÷दो रोज से बुखार है। हम बोला था इ सब झूट झमेला नहीं करने लेकिन आप लोग तो सब जिद्दी का दल।'' कहते हुए अंदर चली गयीं शायद चाय लाने। घोष दा ने हाथ पकड़ा था स्वप्नमय बाबू का− पसीने से भींगा था हाथ− फुसफुसाहट भरी आवाज में कहा− ÷÷रास्ता में बैंक का रिकवरी एजेण्ट लोग बहुत बेइज्जत किया। बोला है घर में भी आयेगा। अभी हम टाइम मांगा है थोड़ा। कुछ इस्टालमेण्ट दिया था, फिर... अंधेरा में बाइक में बगल से गुजरता है− बोलता जाता है− ÷इएमआई दे देना बुढ़ऊ।' चेहरा पहचान नहीं पाया नहीं तो कॉम्प्लेन करता।'' फिर गहरी सांस ली घोष दा ने। निराश स्वर में बोले− ÷÷किसका काम्प्लेन भी करेगा। एक दिन पेशाब करने बैठा तो पीछे में दो छोकरा बाइक रोक के खड़ा है। शाम को.... फिर देखा नहीं.... छोड़ो....''÷÷नहीं, क्या हुआ घोष दा?''घोष दा के हाथ थरथरा रहे थे। कांपती उत्तेजित मगर मद्धिम आवाज में बोले−÷÷सब नष्ट कर देगा। सब नष्ट हो जाएगा।'' डरी आवाज जैसे कुएं के अंदर से आ रही हो− ÷÷किसी से चर्चा मत करना, हो सकता है मेरा वहम भी हो। कुछ बाइकवाला लोग घेरा था हमको, बोला− क्या आलतू फालतू बात का प्रचार करता है। अपना काम कीजिये चुपचाप। बाइक पर पुलिस का वर्दी में गंगापुल के पार लड़का लोग रोड होल्डिंग करता है। ट्रक लूटता है इ सब फालतू बात काहे करते हैं। क्या मतलब है आपका.... सब मफलर से चेहरा ढंका था लेकिन आवाज से लगा बाबू भी था उसमें− तुम्हारा लेड़का।'' फिर अस्फुट स्वर में बोले− ÷÷सब नष्ट हो गया, स्वप्न सब नष्ट.... ÷÷आवाज भीगी हुई थी और हाथों में आतंक की कंपकपी....''लीला भाभी आ गयी थीं और वे चुप हो गये थे और दूसरी रात को पूरी तरह ही चुप हो गये− डॉक्टर ने बताया− ÷मैसिव हार्ट अटैक' और मोहल्ले के आंकड़ेबाजों ने कहा कि घोष दा नर्वस नाइंटीज के शिकार हो गये, क्योंकि रघू की दादी, त्रिावेणी का बाप और सीताराम की मां को लेके चार सौ अट्ठानवे तो हो गया था स्कोर लेकिन चार सौ निन्यानवे में खुद ही....लीला भाभी ने बताया कि कुछ लड़के जीप पर बैठ कर आये और गालीगलौज, धक्का मुक्की भी शायद करके सारा कम्प्यूटर वगैरह उठा कर ले गये। बैंक की जबान में रिकवरी... ÷नहीं− बाबू नहीं था उसमें'.... क्योंकि बाबू तो गृहप्रवेश की पार्टी में व्यस्त था उस रात− पुराने मकान को नया करवा के नये सिरे से गृहप्रवेश। पत्नी के तो पांव ही जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। पड़ते भी तो कैसे, ऐसा चिकना टाइल्स ही था कि पांव बिछल बिछल जा रहा था− फ्राईड राइस, कचौड़ी, पनीर बटर मसाला, − नहीं गृहप्रवेश में नॉनवेज नहीं चलता है न − अंत में आइसक्रीम थी... मतलब दहापेल...।कंठ सूख रहा था स्वप्नमय बाबू का। आज पानी रखना भूल गयी थीं शायद। सौ काम होते हैं गृहप्रवेश में, कोई मामूली फंक्शन थोड़े ही था, कानों में कुछ चर्चा भी पड़ी− ÷÷भोज तो लाजवाब था लेकिन गृहप्रवेश के कार्ड में सिर्फ मां बेटे का ही नाम था, क्या कीजियेगा खैर...''पानी पीने उठे स्वप्नमय बाबू ... दो तीन कदम ही चले होंगे कि रपट गये एकदम चिकने फर्श पर− धड़ाम।÷÷क्या हुआ?'' थकी उनींदी आवाज आयी पत्नी की दूसरे कमरे से।बाबू दौड़ा आया। जीभ एक तरफ लटक गयी थी, सिर टकरा गया था फ्रिज से।÷÷मम्मी दौड़ो, देखो क्या हो गया पप्पा को।''मुंह के एक कोर से लार बह रही थी और आंखों से आंसू।−÷÷हां हां तुरंत चले आओ। गाड़ी ले आना। क्या घोष काकू के यहां क्यों− क्या हार्ट अटैक -- अच्छा जल्दी आओ पापा का एक्सीडेण्ट हो गया है। लगता है हैमरेज हुआ है− फिसल गये थे यार− जल्दी करो।'' बाबू मोबाइल पर व्यस्त था। वह मना करना चाहते थे लेकिन एक गुंगुवाहट और अशक्त हो चुके दांये हाथ की हल्की सी जुम्बिश के अलावे कुछ नहीं कर पाये। गाड़ी नर्सिंग होम की तरफ दौड़ पड़ी थी.... मोबाइल की घंटी बजी।बाबू − ÷÷क्या आदमी नहीं जुट रहा है? अच्छा! उधर का लड़का लोग को फोन कर देते हैं, घोष काकू के यहां पहुंच जाएगा सब। हम तो....''घबराहट में किसी ने गाड़ी का रेडियो चला दिया था। रेडियो में भी अब उतनी जिद नहीं बची थी शायद नहीं तो रात के बारह बजे, भला कोई समय है राग यमन कल्याण बजाने का....

Thursday, June 26, 2008

डर

मेरे पड़ोस मे गिलहरी आती है
मेरे घर मे भी गिलहरी आती है
मेरे पड़ोस मे गौरैया भी आती है
मेरे घर मे भी गौरैया आती है

मेरे पड़ोस मे कई तरह के भय आते हैं
मेरे पड़ोस मे कई तरह के अपराध होते हैं

मगर फिर भी मेरे पड़ोस मे
गौरैया और गिलहरी दोनों आते हैं

कभी कभी मेरे घर पर भी!

मित्रों, मैं अब क्या करूँ
मुझे अब गौरैया और गिलहरी
दोनों से डर लगने लगा है!!

शशि भूषण द्विवेदी

Sunday, September 23, 2007

वन हण्ड्रेड इयर्स ऑफ सालीटयूड और मार्खेज़

मार्खेज़ का प्लीनीयो मेन्दोज़ा द्वारा लिया गया साक्षात्कार पढ़ा, गद्य के जादू को अगर महसूस करना है तो इस उपन्यास को पढ़ें, यह एक ऐसा उपन्यास है जो वृहत होने के बावजूद आपको एक भी पृष्ठ छोड़ने की स्वतंत्रता नहीं देता। पहले-पहल जब जादुई यथार्थवाद के बारे में सुना या पढ़ा था तो इस फ्रेज़ के इस्तेमाल पर खुद को पर चकराने से नहीं रोक सका था, पर उपन्यास पढ़ने के बाद समझ में आया कि वाकई ऐसा भी कुछ सम्भव है। एक साथ अथाह और उदात्त सौन्दर्य के साथ महान वीभत्सता और क्रूरता इस आख्यान में ही सम्भव है। मेल्कीयादेस और अन्य बंजारों के चमत्कारों से लेकर फर्नान्दा का धार्मिक आचरण जो सिर्फ सोने की राजचिह्न वाली चिलमची में शौच करती है, यह सभी कुछ अकल्पनीय है, लेकिन फिर भी मार्खेज़ उसे इतिहास की तरह लिखते हैं और मजबूर करते हैं कि उस पर विश्वास किया जाए। मार्खेज़ ने साक्षात्कार में कहा है कि ''मैं मज़े के लिए लिखने के जाल में फँसा और उसके बाद असल में जहाँ मैंने पाया कि दुनिया में लिखने से अधिक प्रिय मुझे कुछ नहीं था।'' यह बात बड़ी महत्तवपूर्ण है कि एक लेखक जो मज़े के लिए लिखना शुरू करता है उसकी कृति एक बड़े और विस्तृत औपनिवेशिक इतिहास और सांस्कृतिक विमर्श के फलक तक पहुँचती है। मैंने पढ़ते समय यह हमेशा महसूस किया है कि एक ऐसी कृति जो आपको अपने साथ अपने संसार, अपने समय में साथ ले जाती है, वह अनूठी होती है। गाबो (मार्खेज़ का दूसरा नाम) को पढ़ते हुए आपको ऐसा लगेगा कि आप माकोन्दो में ही रह रहे हैं। ओरैलियानो बुएनदीया के उधमी (और उद्यमी भी) परिवार वाले और स्वेटर बुनती हुई उर्सुला का प्रतीक ऐसा चुम्बकीय है कि उपन्यास खत्म होने के बाद माकोन्दो छोड़ते हुए दुख सा होता है। अलग होते हुए भी उपन्यास का संसार इतना यथार्थ बुनता है कि रूपवती रेमेदियोस के स्वर्गारोहण का जादू भी असत्य नहीं लगता। सिर्फ वक्त काटने के लिए कर्नल औरेलियानो का सुनहरी मछलियाँ बनाना और बाद में उन्हें गला देना, ये कुछ ऐसे विवरण हैं, जो आपको फंतासी के करीब लगेंगे लेकिन विश्वास मानिये मार्खेज़ को फंतासी से वितृष्णा है, वे कहते हैं, ''सादा फंतासी जिसका कोई वास्तविक आधार नहीं होता, मुझे बेहद नापसंद है ..... कल्पना और फंतासी के बीच वहीं अंतर है जो एक मनुष्य और वेन्ट्रिलोकिट के पुतले में होता है।''
उपन्यास की विशेषताओं के अतिरिक्त कुछ ख़ास बातें मार्खेज़ की निजी लेखन शैली के बारे में भी बड़ी रोचक हैं, जैसे इस उपन्यास के बारे में सोचने में उन्हें पन्द्रह साल लगे और अन्त में लगभग दो सालों में उन्होंने इसे लिखा। उनके अनुसार अगर कोई विचार पन्द्रह साल से तीस साल तक टिका रह सकता है तो उसे लिखने के सिवाय मेरे पास कोई चारा नहीं। मार्खेज कहते हैं कि उन्हें सुबह रेगिस्तान के द्वीप की चाहिए और रात एक बड़े शहर की जहाँ कुछ अच्छी ड्रिंक्स और दोस्त मिल सकें। लिखते समय वे आश्चर्यजनक रूप से बहुत सारे पन्ने फाड़ते हैं और उन्हें लगता है कि टाइप करते समय उनसे हुई गलती रचनात्मक निर्णय की गलती के बराबर होती है। मार्खेज़ के अनुसार वे बहुत किस्मत वाले हुए तो पूरे दिन में एक पैराग्राफ लिख पाते हैं। मजेदार बात यह कि मार्खेज़ कभी कभी लिखते हुए अचानक लिखने की अवस्था से बाहर आ जाते हैं और ऐसे समय में वे पेंचकस लेकर घर भर के ताले और प्लग ठीक करने लगते हैं या दरवाज़ों पर हरा रंग करते हैं। वस्तुत: यह खुद को री-सेट करने जैसी प्रक्रिया होती है।
यूँ तो यह उपन्यास और मार्खेज़ से जुड़ी हर बात रोचक और मज़ेदार है, लेकिन मेरी संस्तुति यह है कि हर गद्य लेखक को ज़रूरी तौर से मार्खेज़ को अवश्य पढ़ना चाहिए। गद्य का प्रवाह, बाँधे रखने की कला और यथार्थ को रोचक स्वरूप में विन्यस्त कर प्रस्तुत करना वहाँ से सीखा जा सकता है।

हिन्दी विभाग, डीयू का उत्तर-आधुनिक विभाजन

हिन्दी विभाग, डीयू का उत्तर-आधुनिक विभाजन
अगर आपको हिन्दी साहित्य में और खासकर साहित्य पढ़कर पढ़ाने में थोड़ी-सी भी रुचि है तो डीयू के आर्ट्स फैकल्टी में विवेकानन्द (मूर्ति) के आसपास के इलाके में आपको नियमित नहीं तो कभी-कभार जरुर बैठना चाहिए।....ये हिन्दी जगत के लोगों के लिए विधान सभा है। यहां आपको करीब चार तपके के लोग मिल जाएंगे- जिसे विश्लेषण की सुविधा के लिए चार उपशीर्षकों में बांट सकते हैं- (1) अविकसित(2) अर्धविकसित (3) विकसित और (4) पूर्ण विकसित लेकिन बेकार। अब जरा स्थितयों के अनुसार प्रवृतियों का विश्लेषण कर लिय़ा जाए।जो स्टूडेंट या रिसर्चर सीधे विभाग में आया है, इससे पहले उसके पास डीयू में दो-तीन साल काटने का अनुभव नहीं है...वो सारे अविकसित लोग हैं। इस लिहाज से एम.फिल् कर रहा जे.आर.एफ. होल्डर भी बीए कर रहे स्टूडेंट से गया गुजरा है।...इसे पता ही नहीं चल पाता कि लाल तार, केसरिया तार और तिरंगे तार के कनेक्शन्स कहां से जुड़े हैं और पावर ग्रिड कहां है, कहां से बिजली की सप्लाई है जिससे कि वो जगमगाएगा।(2) दूसरी श्रेणी में वो लोग हैं जो विभाग की विकास -प्रक्रिया से जुड़ चुके हैं लेकिन कन्फ्यूजन अभी भी बरकरार है।...ये कन्फ्यूजन विषय, विकल्प, शोध-निर्देशक से लेकर तार के रंगों को लेकर भी है। उन्हें पावर हाउस, सर्किट और सप्लाई सबकुछ का आइडिया है लेकिन इनकी परेशानी थोड़ी दूसरी किस्म की है।.....ये विद्वान होकर पढ़ाना चाहते हैं ,हमारे आपके जैसे नहीं कि भनक लगी नहीं कि फलां जगह सीट खाली है ,जुगाड़ लगाने से काम बन सकता है और भिड़ गए। ये ऐसे लेक्चरर बनना चाहते हैं कि जब ये क्लास लें तो हिन्दी सहित दूसरे विषय और विकल्प के लोग टूट पड़े इनको सुनने के लिए ....खिड़कियों तक पर चढ़ जाएं। इनकी ये नैसर्गिक इच्छा लगभग सारे टीचरों से कुछ-कुछ बटोर लेने के लिए विवश करती है।...लेकिन ऐसा करते वक्त ये भूल जाते हैं कि ठंड़ा-गरम एक साथ मिला देने से सिस्टम शॉट कर जाने का खतरा बना रहता है।....बहरहाल अपनी नजर में ये सेक्यूलर हैं, सही मायने में रिसर्चर लेकिन लोगों ने इन्हें बत्तख नाम दिया है।(3) इस कोटि के रिसर्चर औरों की अपेक्षा ज्यादा सम्मानीय हैं। इनके पास डीयू का लम्बा अनुभव है, पॉवर हाउस, सर्किट, विषय और दूसरी जरुरी बातों के मामले में कॉन्सेप्ट बिल्कुल क्लियर है।...ये एकेश्वरवाद को मानते है। इनके मुताबिक सारे मास्टरों के पास जाने से इन्फेक्शन का खतरा बना रहता है ।......और फिर रिसर्चर में और....में कुछ फर्क भी तो है भाई...क्यों भटकते फिरे।....इस कोटि के लोगों में अगर नेट या जे.आर.एफ. नहीं भी है तो कोई बात नहीं, शक्ति का सोता लगातार फूटता रहता है जो इन्हें बल देता है । फिर इनके हिसाब से नेट- जे.आर.एफ. कुक्कुर-बिलाय का भी निकल जाता है, असल चीज तो है चिंतन।...तो ये चिंतनधारी लोग हैं, अभाव में भी खुशहाल..भविष्य इनका है।(4) वस्तुस्थिति के हिसाब से सबसे बदतर स्थिति में पूर्ण विकसित लोग हैं। क्योंकि इनके पास न तो सीखने के लिए कुछ बचा है और न ही बदलने की कोई गुंजाइश। अपने तरक्की के दौर में इन्होंने अपना जौहर तो खूब दिखाया था, दो तीन कॉलेजों में बतौर गेस्ट लेक्चरर के रुप में पढ़ाया भी । लेकिन अब ये श्रीहीन हो गए। क्योंकि विभाग में जो नया सॉफ्टवेयर आया है उनके हिसाब से ये अनपढ़ हैं। अब इनके लिए विभाग प्रौढ़ शिक्षा की व्यवस्था कराए। पहले वाला जमाना भी गया कि जब जूनियर्स इन्हें घेरे रहते थे। अब तो हर तरह से ये श्रीहीन हैं....और जूनियर्स को हसरत भरी नजर से देखते हैं और थोड़ी इर्ष्या और थोड़ा अफसोस से कहते हैं - तुम्हीं लोगों का अच्छा है जी।....

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'सेज़' एक ऐसा शब्द है जिसे आज अर्थशास्त्री , विद्वान, पत्रकार, बुद्धिजीवी और राजनीतिकर्मी ही नहीं आमआदमी भी जानता है। कहावत है 'लोहे का स्वाद लोहार से नही उस घोडे से पूछो, जिसके मुन्ह मे लगाम है' !स्पेशल इकोनोमिक ज़ोन यानी एस.ई.जेड। अभी कल नवी मुम्बई मे रिलायंस और टाटा की सूचना प्रौद्योगिकी के लिए सरकार ने इसी 'सेज' के तहत उनकी कंपनियों को ज़मीन मुहैय्या कराई है। इसबार शायद मामला किसानों की ज़मीन से नहीं जुडा है इसलिये सबकुछ खामोशी के साथ सम्पन्न हो गया। कोई हल्लागुल्ला, कोई मीडिया हाइप नही.... । बल्कि ठीक इसके साथ-साथ यह खबर भी दी जा रही है कि बंगाल की वाम -मोर्चा सरकार के सूचना मन्त्री महोदय ने भी अपने राज्य के लिये दो लाख आइ टी प्रोफ़ेशनल की ज़रूरतबताई है। जाहिर है वहाँ भी अब नन्दीग्राम और सिंगूर के बाद कहीं और गरीबों किसानों की ज़मीन आइटी कम्पनियों के लिए छीनी जायेगी ।लेकिन एक और सेज़ है, जिसके बारे मे ज़्यादातर चुप्पी है .... । यह दूसरा सेज़ भी पहले वाले बहु-प्रचारित सेज़ केहितो को ध्यान मे रखते हुए ही लागू किया जा रहा है। इस सेज़ की चपेट मे भी देश के गरीब आदिवासी औरवनवासी है। क्योकि नये आर्थिक - तकनीकी विकास के इस सूत्र को अब हर कोई समझने लगा है कि गरीब हीगरीबी का असली कारण है और अगर फकत मुठी भर अमीरों के की अमीरी और अधिक बढाने के राष्टीय उद्देश्यको पूरा करने के लिए देश को १०% के आर्थिक विकास दर को बनाए रखना है तो गरीबो और आदिवासियो कोउनकी ज़मीनो, घरो, जन्गलो, खेतो से बेदखल करना ही पडेगा। १९७५ का मशहूर 'गरीबी हटाओ' का नारा अबगरीब हटाओ' के निर्मम अमलदारी मे बदल चुका है। छ्त्तीसगढ का बस्तर इस नये विकास 'अभियान का इलाका हैयानी इसी ज़गह वह 'दूसरा सेज़' लागू है, जिसका ज़िक्र अभी किया गया था। जब दूसरा सेज़ कम्पलीट होजायेगा तो यहाँ भी आइ टी से लेकर तमाम खनिज कम्पनियाँ सरकार द्वारा दी गयी ज़मीनो पर 'पहले वाले सेज़' कानून के तहत .... कब्जा करेन्गी।आप जानना चाहेगे कि यह दूसरा 'सेज़' क्या है, तो हम बताये देते है : यह है -'स्पेशल एन्काउन्टर ज़ोन' (एस इज़ेड )विख्यात साहित्यिक पत्रिका 'पहल' के नये अंक मे शाकिर अली की कविताये दूसरे 'सेज़' की हिंसक त्रासदी मे घिरेबस्तर के जीवन की ऐसी छवियाँ प्रस्तुत करती है जो न सिर्फ़ हमारी स्मृतियो मे गूजती रह जाती है बल्कि हमेभीतर से बेचैन और उद्वेलित करती है। गौर से देखे तो इस हिंसक सेज़ के अभियान के लिये चलाये जा रहे 'सलवाजुडुम' के पीछे एक भयावह फ़ाशीवादी षडयंत्र है.... एथ्निक क्लीन्ज़िन्ग .... जातीय संहार .....एथ्निक जेनोसाइड। अमेरिका आस्ट्रेलिया के आदि -निवासियों (अबोरिजिंस ) के साथ वहाँ के आप्रवासी गोरों ने यही किया था। यह एक कामयाबअमानवीय समाजार्थिक फार्मूला है। बस्तर के आदिवासियों के उन्मूलन के संदर्भ मे यह इसलिए और भी भयावहहै क्योंकि इसमे उस शक्तिशाली हिंदू सवर्ण के तामाम हिस्सों की गुप्त और प्रछन्न सहमति शामिल है जिन्हे हमआधुनिक और मानवीय राजनीति की लफ्फाजी करते हुए अक्सर देखते हैं ।बहरहाल, जब हमारी आज की समकालीन हिन्दी कविता दिल्ली, भोपाल और दूसरी राजधानियो के कवियों कीमित्र मन्डलियो के उबाऊ और एक-दूसरे को उठाने-गिराने की लिजलिजी भाषाई बाजीगरी, महान होने औरमहान बनाने की संस्थाखोर जुगाडू तिकडम और विचारधाराओं की आड़ में हिंसक जातिवादी अभियानों मे बदलचुकी है...शाकिर अली की कविता विपदा मे घिरे हमारे समय के कमज़ोर और गरीब लोगो के जीवन के भयावहदृश्य प्रस्तुत करती है । १९७५ कें आपातकाल कें दौर मे इन्ही शाकिर अली का लेख छापने कें जुर्म मे पहल सम्पादक (हिंदी के अप्रतिम कथाकार - ज्ञानरंजन ) १९ महीने की लिए मीसा मे जेल जाते-जाते बचे थे । उस समय वह लेख लोकतंत्र की हिफाजत की पक्षमे था और अब यह कवितायेँ मनुष्यता और उसके जीवन के अधिकार और उसकी शांति-स्वतंत्रता के पक्ष में हैं । आप भी देखे कुछ कविताये :एनकाउन्टर डेढ़ सौ बचे बैगा जनजाति को बचाने के लिएडेढ़ करोड़ स्वीकृत किये गए हैं ,और डेढ़ हज़ार करोड़एनकाउन्टर के लिए रख दिए गए हैं ?स्कूल बंद है मोटरसाइकिल से स्कूल जाते गुरूजी कोकिसी ने आवाज दी - रुको !गुरूजी डर के मारे नहीं रुके ,पता नहीं जंगल में कौन रोक रहा है ?पीछे से गोली चली,गुरुजी खून से लथपथ गिर पडे थे,तभी से कोन्गुड का स्कूल बन्द है !!बहस आज बस्तर के हालात पर कोई कुछ नहीं बोलतान बस में न ट्रेन में ,न होटल में और न पान दूकान मे,सब चुप रहते हैं , डर के मारे !वैसे भीयुद्धभूमि में बहस नहीं चलती ,सिर्फ गोलियाँ चलती हैं।लम्बी लडाई ?शिक्षक सन्घ ने शिक्षा कर्मियो कीमौत पर शोक प्रगट करते हुए'लम्बी लडाई' की बात कही थीऔर,प्रशासन से उन्हे 'सुरक्षा' देने कीमान्ग की थी ।

Thursday, September 20, 2007

हर बुद्ध के साथ एक देवदत्त पैदा होता है, और हर गांधी के साथ एक गोडसे... लेकिन कुमारेन्द्र के साथ पैदा हुए थे अतुकांत।देवदत्त खुद को बुद्ध से बड़ा विचारक मानता था, गोडसे खुद को गांधी से बड़ा हिन्दू।इसी श्रृंखला में अतुकांत का दावा था कि वह कुमारेन्द्र से बड़ा कवि है।बुद्ध या गांधी अवतारी नहीं हुआ करते। जीवन की परिस्थितियां उन्हें बुद्ध या गांधी बना देती हैं। सिद्धार्थ जीवन का कटु यथार्थ न देखते, तो शायद बुद्ध न बनते; मोहनदास अंगरेजों द्वारा ट्रेन के डब्बे से फेंके न जाते तो ाायद मोहनदास ही रह जाते, महात्मा गांधी न बनते। लेकिन देवदत्त और गोडसे के साथ यह सब नहीं चलता। वे परिस्थितियों से जन्मे या उनके दास न होते-जन्मता महान् होते हैं-अवतारी पुरु ा।अतुकांत अवतारी पुरु ा ही थे। जन्म से ही कवि। अवतारी कवि। नाना प्रकार की कथाएं-परिकथाएं उनके बारे में प्रचलित थीं। बहुत कम उम्र में ही वे लिजैंन्ड बन चुके थे। जैसे तुलसीदास के बारे में किंवदंतियां हैं कि जन्म से ही उनके बत्तीसों दांत थे या कि जन्मते ही उन्होंने रामनाम का उच्चारण किया था और इसीलिए उनका पुकार नाम रामबोला हो गया-तो अतुकांत के बारे में भी ऐसे कई लटक-झटक थे। तुलसीदास की तरह दांत तो नहीं; लेकिन उनकी गझिन दाढ़ी के जन्म से ही उनके साथ हाने की बात कही जाती थी। और चूंकि रामनाम उच्चारने का युग नहीं था, इसलिए यह कहा जाता था कि प्रचलित प्राइमरी मनोहर पोथी की जगह निराला की प्रसिद्ध कविता 'राम की ाक्ति पूजा` से उन्होंने पढ़ाई की ाुरूआत की। यही उनका ककहरा था। कहते हैं इस कविता ाी र्ाक में विद्यमान ाक्ति को ही आधार बनाकर उनका नाम रखा गया ाक्तिकुमार। विद्यालय-महाविद्यालय के प्रमाण-पत्रों में उनका यही नाम आज भी है। अतुकांत तो उनका कविनाम था। कहते हैं उन्हें यह नाम प्रसिद्ध आलोचक रामविलास ार्मा ने दिया था।अतुकांत क्रांतिकारी कवि थे और केवल क्रांतिकारी कवि ही नहीं, अलग से क्रांतिकारी भी थे। उनका कहना था, जो क्रांतिकारी नहीं होते वे जीवन का यथार्थ समझ ही नहीं पाते। वे संस्कृत का एक लोक सुनाते थे जिसका भावार्थ था, जो बढ़िया ब्रह्मचारी नहीं होते, अर्थात् जिनका ब्रह्मचर्य ही डंवाडोल होता है, उनका गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास सब डंवाडोल होता है। इस लोक का इस्तेमाल वह अपनी इस उक्ति का पक्ष प्रस्तुत करने के लिए करते थे कि जो ढंग के क्रांतिकारी नहीं होते, उनका आगे का जीवन भी डंवाडोल होता हे।कहते हैं नक्सल आंदोलन में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। खुदीराम बोस की तरह कच्ची उमर में ही वह क्रांतिकारी बन गये थे बम-पटाखों के अनुभव भी सुनाते थे। नक्सवालदी आंदोलन सन् ६९ में ाुरू हुआ था, लेकिन वे सन् ६४ से ही उसके साथ थे। ईस्वी सन् की भूल पकड़े जाने पर उन्होंने स्प ट किया ६४ से ६९ तक वे आंदोलन की पीठिका तैयार करते रहे। आंदोलन के नामी-गिरामी नेताओं में कई थे, जिन्हें वे अपना शि य बतलाते थे। उनका कहना था क्रांति जब रास्ते से भटक गयी, तब से उससे अलग हो गये। आंदोलन के लोगों का कहना था क्रांति नहीं, कवि ही भटक गया था।इस क्रांतिकारी जीवन को वे होल-टाइमरी का जमाना कहते थे। इस जमाने में लिखी उनकी कविताओं का एक संकलन 'लाल सितारा` ाी र्ाक से प्रकाशित हो चुका था। नवजागरण प्रकाशन भोपाल से प्रकाशित इस संकलन में उनकी छप्पन कविताएं थीं। और ाायद यही कारण था कि ाहर में यह संकलन 'छप्पन छुरी` के नाम से चर्चित हुआ। उनके जीवन की ही तरह उनका संकलन भी लिजेन्ड बन गया था। कहा जाता था, इसकी कविताओं को पढ़कर कुछ लोगों को बुखार हो आया। एक पुलिस अफसर इसे पढ़कर पागल हो गया। जिस हॉल में इसका विमोचन हुआ, उसमें खुद-ब-खुद आग लग गयी। लड़कियों से जुड़े भी कुछ किस्से थे, जिसे सेंसर के कारण यहां देना मुनासिब नहीं होगा।जैसा कि उनका कहना था, चीन देश की यात्रा वह कर चुके थे। इस यात्रा के बारे में भी उनके दिलचस्प संस्मरण थे, जिसे वह विस्तार से लिख भी चुके थे। एक दैनिक में उनका यह वृत्तांत धारावाहिक छप चुका था। जैसा कि सब लोग जानते हैं, माओ-च-तुंग की मृत्यु १९७६ में हुई थी। और वह १९८० के बाद चीन गये थे। लेकिन उनका दावा था माओ से उनकी मुलाकात हुई थी। इस मुलाकात का दिलचस्प वर्णन उन्होंने अपने यात्रा-वृत्तांत में किया था। उनके अनुसार चीन के मौजूदा ाासकों ने अपने स्वार्थ में यह प्रचार कर रखा है कि माओ मर गये। मंयूरिया इलाके के एक गांव में माओ आज भी किसान का जीवन जी रहे हैं। इस स्थल तक वह बहुत मुश्किल से गये। देखा माओ मुर्गियों को दाना दे रहे हैं। कवि के जाने पर यथोचित स्वागत हुआ। माओ लाल सलाम को भूले नहीं हें। बांस के खूबसूरत मोढ़े पर उन्हें बैठाया गया। माओ ने इन्हें अपने हाथों से बनाया था। गांधी की तरह माओ भी कई हस्तकलाओं में पारंगत हें। बकरी की जगह वह मुर्गी पालते है। सबसे महत्व की बात थी कि माओ हिन्दी बोल रहे थे। हिन्दुस्तानी कम्युनिस्ट पार्टियों के नेता हिन्दी को भले ही हिकारत की नजर से देखते हैं, माओ हिन्दी प्रेमी हैं। और ऐसे-वैसे हिन्दी प्रेमी नहीं, 'राम की ाक्ति पूजा` जैसी क्लि ट कविता उन्हें जुबानी याद है। यहां के कम्युनिस्टों के पास न कोई सांस्कृतिक दृि टकोण है, न ाऊर। इन्हें माओ से सीखना चाहिए।ाऊर और तमीज कवि के प्रिय ाब्द थे। प्रिय से तात्पर्य यह कि इसका इस्तेमाल वह प्राय: करते थे फलाने को इस बात का भी ाऊर नहीं कि... या फिर, उसके पास भा ाा का काई तमीज नहीं है... या इसी राग में कुछ और। इन्हीं ाी र्ाकों से उनकी दो हाइकू कविताएं भी थीं। उनके लेखों में भी ये ाब्द बारंबार आते थे। लेकिन उनकी बातचीत में, एक ाब्द जो खूब आता था, वह था एथू। यह उनका तकिया कलाम था। इसलिए अंतरंग चर्चाओं में ाहर के साहित्यकार मजा लेने के लिए उन्हें कवि एथूदास कहते थे।कविता और क्रांति के अलावा अतुकांत के कई अन्य ागल भी थे। हिन्दी प्रचार, अनुसंधान, लोक संस्कृति आदि से उनका गहरा रिश्ता था।अंग्रेजी और अंगरेजी संस्कृति के वे परम विरोधी थे। लोहिया साहित्य के अध्ययन ने उनके अंग्रेजी विरोध को और गाढ़ा बना दिया था। लेकिन उनका अंग्रेजी ाराब से कोई विरोध नहीं था। उनके कमरे में और कुछ रहे, न रहे, एकाध बोतल अंग्रेजी ाराब अवश्य होती थी। ाराब में सोडा या पानी मिलाना अपनी ाान के खिलाफ समझते थे उन्हें नीट चाहिए होता था। कभी-कभी इस नीट में भांग घोल कर उसे और घनीभूत करते थे। यह उनका अपना प्रयोग था। उनका दावा था, पूरे जंबू द्वीप में कोई माई का लाल इसे नहीं पचा सकता। जब वह इसके ट्रांस में होते थे, तब उनसे कुछ सुनने का अपना ही मजा होता था।यह सब उस दौर की बात है जब नक्सलवादी आंदोलन अपने उफान पर था। कलकत्ता ाहर और बंगाल के केई ग्रामीण इलाके इसके प्रभाव में थे। दूसरे प्रांतों में भी इसका तेजी से फैलाव हो रहा था। सैकड़ों उत्साही नौजवानों को पुलिस ने बर्बरता पूर्वक मार डाला था। किसी भी किस्म के आंदोलनकारी को पुलिस झट से नक्सलवादी कह देती थी। जे.पी. तक के नक्सलवादी होने की बात कही जा रही थी। बंगाल, बिहार और आंध्र प्रदेश के अनेक हिस्से पुलिस छावनी बन चुके थे।ऐसे में क्रांतिकारी कवि अतुकांत अपनी कवितओं में लोक संस्कृति के रंग भरने लगे थे। मादा मन की भी कई कविताएं उन्होंने इन दिनों लिखी थीं। चिड़िया, फूल और बच्चे जेसे तत्व उनकी कविता के सरहद में अब तक नही थे। अब वे भी आने लगे। कवि ने इन्हें छुआ-सहलाया भी। अपना अलग व्यक्तिव उभारने के लिए वे प्राण-पण से जुट गऐ। मेहनत ने असर किया। कुछ नाजुक कवियों से उनकी मित्रता हुई। इस क्रांतिकारी कवि के विकास पर वे प्रसन्न थे।लेकिन इस प्रक्रिया में उनके पुराने मित्र छिटक गये। जिस नयी जमीन पर वह खड़े थे, वह उनके लिए अनजानी-परायी थी। कुछ मित्र मिल जाना और बात है, हकीकत यह थी कि अतुकांत इस दुनिया के लिए प्रवासी पक्षी ही बन सके। इस हिस्से के कवियों ने उन्हें हमेशा विजातीय नजरिये से ही देखा। नतीजा हुआ कि उनके लिखने पर पाला पड़ गया। एक-एक कविता पर महीनों काम करते और जब उसे किसी पत्रिका को भेजते तो वह वैसे ही लौट आती जैसे आईने से परावर्तित होकर कोई किरण। उनका जी उचट गया। अवसाद के इन्हीं क्षणों में उन्होंने लिखा- 'हम तो दोनों ठिकानों से गये।`ये वही दिन थे जब रामविलास ार्मा आलोचना से विमुख होकर इतिहास से अभिमुख हुए थे। अतुकांत को भी लगा, वाकई इतिहास हारे हुओं के लिए हरनाम है। सुकून वहीं मिल सकता है। इतिहास का अर्किडिया उन्हें भी आकि र्ात करने लगा। कविताओं से मुक्त हो वे इतिहास की ारण में आ गये। यहां पत्र-संपर्क और परिचय कोई मदद नहीं कर सकता था। जम कर पढ़ बिना यहां कुछ चलने वाला नहीं था। अतुकांत जी पढ़ाई पर एक बार फिर जमे। जो भी मिला-जैसा भी मिला धंुआधार पढ़ाई की। मन लगने लगा। कविता तो कोई भी कर सकता है। लेकिन इतिहास की साधना। सबसे संभव है क्या? कदापी नहीं। अब जाकर उन्हें लगा कि इतिहास के संधान के बिना उनका जीवन अधूरा था। इसके बिना तो ढंग से कविता भी नहीं लिखी जा सकती। व र्ाों उन्होंने इतिहास को ओढ़ना-बिछौना बनाये रखा। भाजपाईयों की तरह उनका भी मानना था कि इतिहास को एकपक्षीय नहीं होना चाहिए। इस नजरिये को लेकर रामविला ार्मा जहां मोटे-मोटे ग्रंथ लिख रहे थे, वहां वे पुस्तिकाएं लिख रहे थे। दर्जन भर से अधिक उनकी पुस्तिकाएं छप चुकी थीं। उनका मानना था क्रांति किताबों से नहीं इन कितबियों से होगी।इन फुटकर लेखन के साथ उनका एक ाोधपरक ग्रंथ 'कवि कुंभनदास` भी प्रकाशित हुआ। यह ग्रंथ लिख कर एक तरह से वह अपने पूर्वजों के ऋण से मुक्त हुए थे। उनका दावा था कि कुंभनदास उनके पूर्वज थे। उनकी पच्चीसवीं पीढ़ी में वे स्वयं को रखते थे। खुद को उनकी ही तरह खुद्दार बनाये रखने में उनका बहुत नुकसान हो चुका था। लेकिन कुल की परंपरा बनाये रखना उनके लिए महत्त्वपूर्ण था। अपनी ताजा कृति जब उन्होंने कवि कुंभनदास को समर्पित की थी, तब लोगों को अटपटा लगा था। लेकिन जल्दी ही यह बात ाहर में फैल गयी कि कवि अतुकांत कुंभनदास के वंशज हैं। इस चर्चा से उन्हें फायदा ही हुआ। कुंभनदास कॉलेज में उन्हें व्याख्याता का स्थायी पद मिल गया। वे साहित्य के अध्यापक हो गये। अच्छी तनख्वाह मिलने लगी। उन्होंने अपने एक मित्र को लिखा- 'जिन्दगी अब स्थायित्व ले रही है। अब साहित्य का काम निश्चिंत होकर कर सकूंगा। इसे नयी जिन्दगी की शुरूआत ही कहिये।`नयी जिन्दगी की इसी शुरूआत में उनकी कविताओं का दूसरा सकंलन प्रकाशित हुआ। 'उपरांत` शीर्षक इस संकलन में उनकी वे कविताएं थीं, जो क्रांतिकारी दौर के बाद लिखी गई थीं। कोमल प्रकाशन ने इसे सुरूचिपूर्ण ढंग से प्रकाशित किया था। कवि का पत्र-संपर्क अब तक अच्छा-खासा हो चुका था। इस संपर्क का उन्होंने भरपूर इस्तेमाल किया। चारों तरफ समीक्षाएं छपीं। लेकिन कविजी का भाग्य। कवियों के समाज में उन्हें कोई खास जगह नहीं मिल सकी। 'इतिहास में कुछ समय के लिए जो भटक गया था, उसी का खामियाजा भुगत रहा हूं और कुछ नहीं। जल्दी ही सब ठीक कर लूंगा। उन्होंने अपना इरादा पक्का किया। कमर कसी। कठिन परिश्रम कर अपने अंदाज में कुछ धांसू कविताएं लिखीं। कई तरह के पापड़ बेल कर कुछ धांसू पत्रिकाओं में छपवायीं भी। लेकिन फिर कोई नोटिस नहीं....कविजी कौंच कर रह गये।साहित्य के वातावरण को उन्होंने जम कर कोसा। 'साहित्य में प्रदूषण` शीर्षक से एक साहित्यिक मासिक मेंे लेख भी लिखा। किसी चीज का कोई असर नहींं। लेकिन कविजी ने हार नहीं मानी। इन्हीं दिनों उनका संपर्क 'कंवल` पत्रिका के नामी संपादक और भूतपूर्व कवि चिनगारी जी से हुआ। संपर्क के कुछ ही समय बाद दोनों को एक दूसरे के कवि कुंभनदास के खानदान से जुड़े होने की जानकारी हुई। इस जानकारी ने संपर्क को प्रगाढ़ बना दिया। चिनगारी जी अतुकांत से वय में कोई दस साल बड़े थे। लकिन बड़प्पन का परिचय दिया अतुकांतजी ने। चिनगारी जी को भईया कहना शुरु किया। चिनगारी जी के नाम उनके पत्रों की शुरुआत पहले प्रिय चिनगारी जी से हाती थी, अब हाने लगी पूज्य भइया से। पूज्य भइया ने अपनी पत्रिका का एक विशेषांक अतुकांत पर निकाल। कई आलेख उनकी कविताओंे पर लिखवाये गये। लेकिन साहित्य की दुनिया ऐसी असंवेदनशील कि विशेषांक की कोई खास नोटिस नहीं ली गई। कहने वालों ने कहा उसे कूड़ेदान में भी जगह नहीं मिली।साहित्य के इसी असंवदेनशील आचरण ने कवि अतुकांत को देखदत्त बना डाला। जिस कुमारेन्द्र को संस्कृति की कोई समझदारी नहीं, जो कभी साहित्य का विद्यार्थी नहीं रहा, जिसके वंश में दूर-दूर तक कोई ककहरा जानने वाला नहीं, जिसे पहनने-ओढ़ने, उठने-बैठने, बोलने-बतियाने का शऊर नहीं, उसे कुमारेन्द्र की इतनी चर्चा। इतनी प्रतिष्ठा। और कविकुल शिरोमणि कुंभनदास के वंशधर, साहित्य के परम ज्ञाता, महान् आलोचक रामविलास जी के परम प्रिय, नक्सल मूवमेंट के होलटाइमर कवि अतुकांत की कोई नोटिस नहीं, तो इसका साफ मतलब है आज का साहित्य मीडियाकारों, लंपटों, अज्ञानियों और अकुलीनों द्वारा पोषित और इसलिए प्रदूषित है। ऐसे साहित्य पर थू करने के अलावा वह और क्या कर सकता है। अपनी प्रतिक्रिया के सिलसिले में कवि नागार्जुन की इन पंक्तियों को भी अपने अभिप्राय के साथ नत्थी किया-'साहित्य तेरा बुरा हो, काट लूं गला यदि हाथ में छुरा हो।`साहित्य का गला तो वह नहीं काट सकेे, एक बार अपना ही गला काटने अर्थात् आत्महत्या करने की कोशिश उन्होंने जरूर की किन्तु इसमें भी वे फिल रहे।। इस घटना ने उन्हें कुछ समय के लिए तोड़ कर रख दिया। हुआ यह कि आत्महत्या के प्रयास की खबर शहर के सबसे अधिक बिकने वाले दैनिक के तीसरे यानी नगर पृष्ठ पर एक कॉलम में बस 'इतना`-सा प्रकाशित हुआ। यानी उनकी हत्या-आत्महत्या की खबर भी, इस शहर इस समाज के लिए कोई अर्थ नहीं रखती? यदि वह मर जाता, तो क्या यह समाचार तीसरे पृष्ठ पर ही-और वह सिर्फ एक कॉलम में, उतना-सा ही प्रकाशित होता। इतना निरर्थक प्राणी है वह। उसकी साहित्यिक सेवाओं का बस यही मूल्य है। ज़रा स्थिर होकर उन्होंने अपनी डायरी में विस्तार से अपनी पीड़ा दर्ज की-'जिस पैशाचिक समाज ने निराला और रामविलास जी की कोई इज्जत कोई परवाह नहीं की, उससे कोई आशा, कोई उम्मीद रखना मूर्खता के सिवा कुछ नहीं है।` कवि ने एक लंबी कविता में इन भावों को अभिव्यक्ति दी। अनेक पत्रिकाओं से लौटकर जब कविता आई, तब उस पर अद्यतन तारीख डालकर एक मार्मिक पत्र के साथ चिनगारी जी को भेजा। 'कंवल` के अगले ही अंक में संपादकीय टिप्पणी के साथ कविता प्रकाशित हुई। कवि के पास कुछ आत्मीय पत्र आये। जीने की आश्वस्ति मिली। चिनगारी भइया के रहते वह कैसे कह सकता है कि साहित्य में उसके लिए जगह नहीं है। अनेक कवि-लेखक ऐसे हुए हैं, जिनके महत्व को उनके जीवन में नही समझा गया। शायद वह ऐसा ही कवि है। भविष्य की महाकवि।वह धीरे-धीरे संतुलित हो रहे थे। इसी तरह चल रहा होता, तो संभवत: वह जल्दी ही सामान्य भी हो जाते। लेकिन फिर एक 'दुर्घटना` हुई। कुमारेन्द्र को इन्हीं दिनों साहित्य का एक प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल गया। और वह भी किस संकलन पर! जिसका ब्लर्ब लिखाने के लिए कुमारेन्द्र कोई दस दफा आया होगा। आखिर वह क्या करता। लिखना पड़ा उसे शंकर की तरह वह भावनाओं का शिकर हो जाता है। और नहीं तो क्या। ब्लर्ब ही इतना प्रभावशाली था कि पुरस्कार चयन समिति के लोग प्रभावित हो गये होंगे। पूरा संकलन पढ़ने की फुर्सत किसे रहती है। फिर कुमारेन्द्र के जुगाड़ का क्या कहना। राजनैतिक संपर्क भी उसके कम हैं क्या। निश्चय ही राजनैतिक दखलअंदाजी भी हुई होगी। साहित्य का प्रदूषण यूं ही तो नहीं बना हुआ है।बड़ी मुश्किल से उन्होंने ज्लां पॉल सार्त्र की एक तस्वीर कहीं से जुटायी। इन दिनों यह तस्वीर उन्हें बेहद प्रिय थी। उन्होंने अपने कमरे में इसे ऐसी जगह लगाया था, जिससे यह आसानी से दिख सके। आने वालों से कहते, लेखक यह है..नोबेल पुरस्कार मिला और इसने लतिया दिया। लेखक ने पुरस्कार की हैसियत बता दी। इसको लेखक कहते हैं। पुरस्कार की नाव पर साहित्य की यात्रा करते हैं, वे और लोग होते हैं।यही सब बड़बड़ाते, बतियाते उन्होंने स्वयं को ऐसा बना लिया कि शहर में यह खबर फैल गई कि अतुकांत जी एक बार फिर अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं। इस बार वे कुछ अधिक ही असामान्य थे। इसका पता इससे चला कि जिस अंग्रेजी से वह नफरत करते थे, उसका इस्तेमाल इन दिनों कुछ ज्यादा करने लगे थे। इन दिनों इसी में वह सामान्य पत्राचार भी करते थे।कुंभनदास कॉलेज के पिं्रसिपल ने उनकी अस्वस्थता को गंभीरता से लिया। कवि कुंभनदास के वंशधर कवि अतुकांत कॉलेज की शोभा हैं। इनकी सेवा पाकर कॉलेज कृतार्थ हुआ है। कॉलेज का परम धर्म है कि वह कवि के इलाज की समुचित व्यवस्था करे। मेधावियों को मानसिक बीमारी होती रहती है। राहुलजी जैसा महापंडित भी मानसिक व्याधि से ग्रस्त होना ही यह सिद्ध करता है कि वे परम मेधावी है। हम उन्हें ऐसे ही कैसे छोड़ सकते हैं।शहर के सबसे बड़े मनोरोग चिकित्सक डाक्टर पिपलानी थे, जिन्होंने उस पुलिस अधिकारी का इलाज किया था, जो अतुकांत की कविताओं को पढ़ कर असामान्य हो गया था। तो यह रहा खुराफ़ाती कवि। डाक्टर मुस्कुराये। तीन दिनों तक गहन जांच चलती रही। इस बीच पाया गया कि कवि की आंखें कुछ ज्यादा तनीं हैं। चेहरे पर भी भयानक तनाव तिरा होता था। डॉक्टर ने कवि की स्थिति को चिन्ताजनक बतलाया।बीमारी का हाल जान चिनगारी जी दौड़े आये। उनके आने से शहर के तमाम रचनाकारों में कवि के प्रति भावना उमड़ी। चिनगारी जी ने बाजाप्ता प्रेस-कांफ्रेंस कर अतुकांत की विक्षिप्तता की तुलना निराला की विक्षिप्तता से की।फिर तो बयानों और गोष्ठियों का तांता लग गया। अखबारों में लेख और संपादकीय लिखे जाने लगे। गवर्नर और मुख्यमंत्री अतुकांत जी से मिलने आये। सरकारी सहायता की पेशकश की गयी। साहित्य का मनीषी विक्षिप्त हो रहा है, इसका अर्थ है हमारा सांस्कृतिक संकट गहरा है।इन दिनों उनकी कविताएं भी चर्चा में आयीं। उत्साही नौजवानों के सांस्कृतिक दल ने उनकी कविताओं के पोस्टर बनवाये। इन पोस्टरों की जगह-जगह प्रदर्शनियां लगीं। 'लाल सितारा` और 'उपरांत` की प्रतियां भी बिकीं। उनके संपूर्ण साहित्य परा शोध करने के लिए यूनिवर्सिटी की एक छात्रा ने निबंधन करवाया। फिलहाल कुमारेन्द्र काफी पीछे छूट चुके थे। साहित्याकश में अतुकांत जी भोर के तारे की तरह सुर्ख जमे हुए थे। क्षितिज पर केवल वह थे, दूर-दूर तक दूसरा कोई नहीं था।जब सारी दुनिया अतुकांत जी के लिए हाय-हाय कर रही थी, तब वे इत्मीनान से अपनी डायरी लिख रहे थे और इसी क्रम में एक रोज उन्होंने लिखा-'पहली बार जीवन में जीत हासिल हुई है। कुमारेन्द्र के पुरस्कार पाने के समाचार को अपनी अस्वस्थता के समाचार से दबा दिया मैंने। इसमें मुझे इतना आनंद आया जितना गोटफ्रिट लिबनिज को दबाने-सताने में न्यूटन को न आया होगा। साहित्यिक समाज ने पहली बार मेरे प्रति हमदर्दी जतायी। चिनगारी भाई के ऋण से इस जन्म में तो उऋण नहीं ही हो सकता। कॉलेज के प्रिंसिपल सहित अन्य मित्रों ने भी पहली बार इतनी सहृदयता दिखलायी...मन गुब्बार बनता हुआ अंतरिक्ष में हौले-हौले उठ रहा था..कि अचानक अवरोह का एक भाव आया.. मन में एक बड़े प्रश्न की तरह उठा-लेकिन.. लेकिन सब मिलाकर निष्कर्ष क्या निकला??? यही न कि साहित्येत्तर चीजों को लेकर ही लोग साहित्य में चर्चित होते हैं। मैं अपनी कविता के द्वारा उस तरह चर्चित नहीं हुआ जिस तरह अपनी बीमारी से। यही तो हो रहा है, जो नहीं होना चाहिए था..`'..जो नहीं होना चाहिए था` इस वाक्य पर आकर अतुकांत रुक गये। कुछ समय तक बिल्कुल खामोश रहे। फिर इस वाक्य के नीचे लगातार कई बार रेखायें भी खींचते रहे। ऐसा लग रहा था कि वे खुद में खोये जा रहे हैं। जैसे कोई रूहानी चीज उनके भीतर समायी जा रही थी और वे सुध-बुध खोये बैठे थे मानो आत्म सम्मोहन की स्थिति में आ ये हों।उन्होंने कलम रख दी। उठ कर खड़े हो गये। खिड़की तक आये। यूं ही बार झांक कर देखा। अपनी ही परछाइंर् थी। देर तक उसे ही देखते रहे उसी से बात करने की इच्छा हुई-कहो अतुकांत, कैसा चल रहा है? परछाइंर् उन्हीं की तरह खामोश रही। कुछ समय तक खेड़े रहकर वे पीछे लौट गये। दोनों हाथ पीछे कर कमरे में चहलकदमी करते रहे। कुछ सूझा और आलमारी तक आये। उन पर जो लेख, टिप्पणियां, चर्चायें छपी थीं, उनके कतरन बहुत संभाल कर उन्होंने एक जगह रखा था। उसे इकट्ठे निकाल। उलट-पुलट कर देखते रहे। चिनगारी जी की प्रेस-कांफ्रेंस, अनवर साहब का लेख, 'तीरंदाज` का संपादकीय लेख विभिन्न लेखक संगठनों की ओर से अलग-अलग और फिर संयुक्त वक्तव्य, यूनिवर्सिटी के छात्रों द्वारा दिया गया धरना, गवर्नर से मिलने जा रहा लेखकों का शिष्ट मंडल, प्रतिपक्ष के नेता द्वारा विधान सभा में उठाया गया सवाल, मुख्यमंत्री के साथ मुख पृष्ठ पर प्रकाशित अपनी तस्वीर.. अतुकांत जोर-जोर से हंसने लगे। कमरे में कोई नहीं था और वे हंसे जा रहे थे। ..इसी हंसी के बीच उन्होंन कतरनों की चिन्दियां बनानी शुरू की। बड़बड़ाये..स्साली ख्याति! तेरी ऐसी की तैसी। हिपोंक्रिसी की भी हद होती है। नहीं बनना मुझे कवि। मैं अतुकांत ही काफी हूं। ..उससे भी न हुआ तो अपना शक्ति कुमार....और एथूदास? ..जैसे भीतर से किसी ने गहरे व्यंग्य के साथ प्रश्न किया। उसे मालूम था शहर के कुछ मित्र एथूदास कहकर उसका मजाक उड़ाते हैं। वह मुस्कुराया। हां, एथूदास भी बुरा नहीं है। चाहे जिस रूप में करें मेरी चर्चा ही तो करते हैं लोग। भूल नहीं गये हैं न मुझे। और जब एथूदास कहते हैं, तब इसका मतलब है कहीं-न-कहीं मुझसे प्यार भी करतेे हैं। उसने याद किया किस तरह वह माया अपनी अनुरागी सहपाठी को उसी की एक बात लेकर चिढ़ाया करता था। वह किस तरह चिढ़ती और वह खिलखिलाता था। दरअसल प्यार में पेंगे मारने के दिन थे वे।एथूदस! अब तुम किसी से प्यार नहीं करते। हमेशा तने रहते हो। मान-सम्मान और स्थापित हाने की चिंता में तुम अमानवीय होकर हर गये हो। दिन-रात अपना झंडा गाड़ने की फिराक में लगे तुम कितने हास्यास्पद हो गये हो, इसका पता भी है तुझे! चिड़िया, फूल, पत्ते सबसे तुम जुड़े, लेकिन अपनी महत्वाकांक्षा साथ लेकर। महत्वाकांक्षा लेकर प्यार नहीं किया जाता कवि। समर्पण के साथ प्यार होता है। खुद को मिटाना पड़ता है। और तुम हो कि दुनिया को मिटाना चाहते हो खुद के लिए। हुंह...वह बिस्तर पर आ गया। अच्छा महसूस कर रहा था। डायरी को एक बार फिर उठाया। सहलाया। कलम लेकर कुछ अनर्गल रेखायें खींचता रहा।..और उस रात उसने फिर एक कविता लिखी। शीर्षक दिया- कुमारेन्द्र के लिए। कविता के नीचे लिखा- एथूदास।