Sunday, September 23, 2007

वन हण्ड्रेड इयर्स ऑफ सालीटयूड और मार्खेज़

मार्खेज़ का प्लीनीयो मेन्दोज़ा द्वारा लिया गया साक्षात्कार पढ़ा, गद्य के जादू को अगर महसूस करना है तो इस उपन्यास को पढ़ें, यह एक ऐसा उपन्यास है जो वृहत होने के बावजूद आपको एक भी पृष्ठ छोड़ने की स्वतंत्रता नहीं देता। पहले-पहल जब जादुई यथार्थवाद के बारे में सुना या पढ़ा था तो इस फ्रेज़ के इस्तेमाल पर खुद को पर चकराने से नहीं रोक सका था, पर उपन्यास पढ़ने के बाद समझ में आया कि वाकई ऐसा भी कुछ सम्भव है। एक साथ अथाह और उदात्त सौन्दर्य के साथ महान वीभत्सता और क्रूरता इस आख्यान में ही सम्भव है। मेल्कीयादेस और अन्य बंजारों के चमत्कारों से लेकर फर्नान्दा का धार्मिक आचरण जो सिर्फ सोने की राजचिह्न वाली चिलमची में शौच करती है, यह सभी कुछ अकल्पनीय है, लेकिन फिर भी मार्खेज़ उसे इतिहास की तरह लिखते हैं और मजबूर करते हैं कि उस पर विश्वास किया जाए। मार्खेज़ ने साक्षात्कार में कहा है कि ''मैं मज़े के लिए लिखने के जाल में फँसा और उसके बाद असल में जहाँ मैंने पाया कि दुनिया में लिखने से अधिक प्रिय मुझे कुछ नहीं था।'' यह बात बड़ी महत्तवपूर्ण है कि एक लेखक जो मज़े के लिए लिखना शुरू करता है उसकी कृति एक बड़े और विस्तृत औपनिवेशिक इतिहास और सांस्कृतिक विमर्श के फलक तक पहुँचती है। मैंने पढ़ते समय यह हमेशा महसूस किया है कि एक ऐसी कृति जो आपको अपने साथ अपने संसार, अपने समय में साथ ले जाती है, वह अनूठी होती है। गाबो (मार्खेज़ का दूसरा नाम) को पढ़ते हुए आपको ऐसा लगेगा कि आप माकोन्दो में ही रह रहे हैं। ओरैलियानो बुएनदीया के उधमी (और उद्यमी भी) परिवार वाले और स्वेटर बुनती हुई उर्सुला का प्रतीक ऐसा चुम्बकीय है कि उपन्यास खत्म होने के बाद माकोन्दो छोड़ते हुए दुख सा होता है। अलग होते हुए भी उपन्यास का संसार इतना यथार्थ बुनता है कि रूपवती रेमेदियोस के स्वर्गारोहण का जादू भी असत्य नहीं लगता। सिर्फ वक्त काटने के लिए कर्नल औरेलियानो का सुनहरी मछलियाँ बनाना और बाद में उन्हें गला देना, ये कुछ ऐसे विवरण हैं, जो आपको फंतासी के करीब लगेंगे लेकिन विश्वास मानिये मार्खेज़ को फंतासी से वितृष्णा है, वे कहते हैं, ''सादा फंतासी जिसका कोई वास्तविक आधार नहीं होता, मुझे बेहद नापसंद है ..... कल्पना और फंतासी के बीच वहीं अंतर है जो एक मनुष्य और वेन्ट्रिलोकिट के पुतले में होता है।''
उपन्यास की विशेषताओं के अतिरिक्त कुछ ख़ास बातें मार्खेज़ की निजी लेखन शैली के बारे में भी बड़ी रोचक हैं, जैसे इस उपन्यास के बारे में सोचने में उन्हें पन्द्रह साल लगे और अन्त में लगभग दो सालों में उन्होंने इसे लिखा। उनके अनुसार अगर कोई विचार पन्द्रह साल से तीस साल तक टिका रह सकता है तो उसे लिखने के सिवाय मेरे पास कोई चारा नहीं। मार्खेज कहते हैं कि उन्हें सुबह रेगिस्तान के द्वीप की चाहिए और रात एक बड़े शहर की जहाँ कुछ अच्छी ड्रिंक्स और दोस्त मिल सकें। लिखते समय वे आश्चर्यजनक रूप से बहुत सारे पन्ने फाड़ते हैं और उन्हें लगता है कि टाइप करते समय उनसे हुई गलती रचनात्मक निर्णय की गलती के बराबर होती है। मार्खेज़ के अनुसार वे बहुत किस्मत वाले हुए तो पूरे दिन में एक पैराग्राफ लिख पाते हैं। मजेदार बात यह कि मार्खेज़ कभी कभी लिखते हुए अचानक लिखने की अवस्था से बाहर आ जाते हैं और ऐसे समय में वे पेंचकस लेकर घर भर के ताले और प्लग ठीक करने लगते हैं या दरवाज़ों पर हरा रंग करते हैं। वस्तुत: यह खुद को री-सेट करने जैसी प्रक्रिया होती है।
यूँ तो यह उपन्यास और मार्खेज़ से जुड़ी हर बात रोचक और मज़ेदार है, लेकिन मेरी संस्तुति यह है कि हर गद्य लेखक को ज़रूरी तौर से मार्खेज़ को अवश्य पढ़ना चाहिए। गद्य का प्रवाह, बाँधे रखने की कला और यथार्थ को रोचक स्वरूप में विन्यस्त कर प्रस्तुत करना वहाँ से सीखा जा सकता है।

हिन्दी विभाग, डीयू का उत्तर-आधुनिक विभाजन

हिन्दी विभाग, डीयू का उत्तर-आधुनिक विभाजन
अगर आपको हिन्दी साहित्य में और खासकर साहित्य पढ़कर पढ़ाने में थोड़ी-सी भी रुचि है तो डीयू के आर्ट्स फैकल्टी में विवेकानन्द (मूर्ति) के आसपास के इलाके में आपको नियमित नहीं तो कभी-कभार जरुर बैठना चाहिए।....ये हिन्दी जगत के लोगों के लिए विधान सभा है। यहां आपको करीब चार तपके के लोग मिल जाएंगे- जिसे विश्लेषण की सुविधा के लिए चार उपशीर्षकों में बांट सकते हैं- (1) अविकसित(2) अर्धविकसित (3) विकसित और (4) पूर्ण विकसित लेकिन बेकार। अब जरा स्थितयों के अनुसार प्रवृतियों का विश्लेषण कर लिय़ा जाए।जो स्टूडेंट या रिसर्चर सीधे विभाग में आया है, इससे पहले उसके पास डीयू में दो-तीन साल काटने का अनुभव नहीं है...वो सारे अविकसित लोग हैं। इस लिहाज से एम.फिल् कर रहा जे.आर.एफ. होल्डर भी बीए कर रहे स्टूडेंट से गया गुजरा है।...इसे पता ही नहीं चल पाता कि लाल तार, केसरिया तार और तिरंगे तार के कनेक्शन्स कहां से जुड़े हैं और पावर ग्रिड कहां है, कहां से बिजली की सप्लाई है जिससे कि वो जगमगाएगा।(2) दूसरी श्रेणी में वो लोग हैं जो विभाग की विकास -प्रक्रिया से जुड़ चुके हैं लेकिन कन्फ्यूजन अभी भी बरकरार है।...ये कन्फ्यूजन विषय, विकल्प, शोध-निर्देशक से लेकर तार के रंगों को लेकर भी है। उन्हें पावर हाउस, सर्किट और सप्लाई सबकुछ का आइडिया है लेकिन इनकी परेशानी थोड़ी दूसरी किस्म की है।.....ये विद्वान होकर पढ़ाना चाहते हैं ,हमारे आपके जैसे नहीं कि भनक लगी नहीं कि फलां जगह सीट खाली है ,जुगाड़ लगाने से काम बन सकता है और भिड़ गए। ये ऐसे लेक्चरर बनना चाहते हैं कि जब ये क्लास लें तो हिन्दी सहित दूसरे विषय और विकल्प के लोग टूट पड़े इनको सुनने के लिए ....खिड़कियों तक पर चढ़ जाएं। इनकी ये नैसर्गिक इच्छा लगभग सारे टीचरों से कुछ-कुछ बटोर लेने के लिए विवश करती है।...लेकिन ऐसा करते वक्त ये भूल जाते हैं कि ठंड़ा-गरम एक साथ मिला देने से सिस्टम शॉट कर जाने का खतरा बना रहता है।....बहरहाल अपनी नजर में ये सेक्यूलर हैं, सही मायने में रिसर्चर लेकिन लोगों ने इन्हें बत्तख नाम दिया है।(3) इस कोटि के रिसर्चर औरों की अपेक्षा ज्यादा सम्मानीय हैं। इनके पास डीयू का लम्बा अनुभव है, पॉवर हाउस, सर्किट, विषय और दूसरी जरुरी बातों के मामले में कॉन्सेप्ट बिल्कुल क्लियर है।...ये एकेश्वरवाद को मानते है। इनके मुताबिक सारे मास्टरों के पास जाने से इन्फेक्शन का खतरा बना रहता है ।......और फिर रिसर्चर में और....में कुछ फर्क भी तो है भाई...क्यों भटकते फिरे।....इस कोटि के लोगों में अगर नेट या जे.आर.एफ. नहीं भी है तो कोई बात नहीं, शक्ति का सोता लगातार फूटता रहता है जो इन्हें बल देता है । फिर इनके हिसाब से नेट- जे.आर.एफ. कुक्कुर-बिलाय का भी निकल जाता है, असल चीज तो है चिंतन।...तो ये चिंतनधारी लोग हैं, अभाव में भी खुशहाल..भविष्य इनका है।(4) वस्तुस्थिति के हिसाब से सबसे बदतर स्थिति में पूर्ण विकसित लोग हैं। क्योंकि इनके पास न तो सीखने के लिए कुछ बचा है और न ही बदलने की कोई गुंजाइश। अपने तरक्की के दौर में इन्होंने अपना जौहर तो खूब दिखाया था, दो तीन कॉलेजों में बतौर गेस्ट लेक्चरर के रुप में पढ़ाया भी । लेकिन अब ये श्रीहीन हो गए। क्योंकि विभाग में जो नया सॉफ्टवेयर आया है उनके हिसाब से ये अनपढ़ हैं। अब इनके लिए विभाग प्रौढ़ शिक्षा की व्यवस्था कराए। पहले वाला जमाना भी गया कि जब जूनियर्स इन्हें घेरे रहते थे। अब तो हर तरह से ये श्रीहीन हैं....और जूनियर्स को हसरत भरी नजर से देखते हैं और थोड़ी इर्ष्या और थोड़ा अफसोस से कहते हैं - तुम्हीं लोगों का अच्छा है जी।....

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'सेज़' एक ऐसा शब्द है जिसे आज अर्थशास्त्री , विद्वान, पत्रकार, बुद्धिजीवी और राजनीतिकर्मी ही नहीं आमआदमी भी जानता है। कहावत है 'लोहे का स्वाद लोहार से नही उस घोडे से पूछो, जिसके मुन्ह मे लगाम है' !स्पेशल इकोनोमिक ज़ोन यानी एस.ई.जेड। अभी कल नवी मुम्बई मे रिलायंस और टाटा की सूचना प्रौद्योगिकी के लिए सरकार ने इसी 'सेज' के तहत उनकी कंपनियों को ज़मीन मुहैय्या कराई है। इसबार शायद मामला किसानों की ज़मीन से नहीं जुडा है इसलिये सबकुछ खामोशी के साथ सम्पन्न हो गया। कोई हल्लागुल्ला, कोई मीडिया हाइप नही.... । बल्कि ठीक इसके साथ-साथ यह खबर भी दी जा रही है कि बंगाल की वाम -मोर्चा सरकार के सूचना मन्त्री महोदय ने भी अपने राज्य के लिये दो लाख आइ टी प्रोफ़ेशनल की ज़रूरतबताई है। जाहिर है वहाँ भी अब नन्दीग्राम और सिंगूर के बाद कहीं और गरीबों किसानों की ज़मीन आइटी कम्पनियों के लिए छीनी जायेगी ।लेकिन एक और सेज़ है, जिसके बारे मे ज़्यादातर चुप्पी है .... । यह दूसरा सेज़ भी पहले वाले बहु-प्रचारित सेज़ केहितो को ध्यान मे रखते हुए ही लागू किया जा रहा है। इस सेज़ की चपेट मे भी देश के गरीब आदिवासी औरवनवासी है। क्योकि नये आर्थिक - तकनीकी विकास के इस सूत्र को अब हर कोई समझने लगा है कि गरीब हीगरीबी का असली कारण है और अगर फकत मुठी भर अमीरों के की अमीरी और अधिक बढाने के राष्टीय उद्देश्यको पूरा करने के लिए देश को १०% के आर्थिक विकास दर को बनाए रखना है तो गरीबो और आदिवासियो कोउनकी ज़मीनो, घरो, जन्गलो, खेतो से बेदखल करना ही पडेगा। १९७५ का मशहूर 'गरीबी हटाओ' का नारा अबगरीब हटाओ' के निर्मम अमलदारी मे बदल चुका है। छ्त्तीसगढ का बस्तर इस नये विकास 'अभियान का इलाका हैयानी इसी ज़गह वह 'दूसरा सेज़' लागू है, जिसका ज़िक्र अभी किया गया था। जब दूसरा सेज़ कम्पलीट होजायेगा तो यहाँ भी आइ टी से लेकर तमाम खनिज कम्पनियाँ सरकार द्वारा दी गयी ज़मीनो पर 'पहले वाले सेज़' कानून के तहत .... कब्जा करेन्गी।आप जानना चाहेगे कि यह दूसरा 'सेज़' क्या है, तो हम बताये देते है : यह है -'स्पेशल एन्काउन्टर ज़ोन' (एस इज़ेड )विख्यात साहित्यिक पत्रिका 'पहल' के नये अंक मे शाकिर अली की कविताये दूसरे 'सेज़' की हिंसक त्रासदी मे घिरेबस्तर के जीवन की ऐसी छवियाँ प्रस्तुत करती है जो न सिर्फ़ हमारी स्मृतियो मे गूजती रह जाती है बल्कि हमेभीतर से बेचैन और उद्वेलित करती है। गौर से देखे तो इस हिंसक सेज़ के अभियान के लिये चलाये जा रहे 'सलवाजुडुम' के पीछे एक भयावह फ़ाशीवादी षडयंत्र है.... एथ्निक क्लीन्ज़िन्ग .... जातीय संहार .....एथ्निक जेनोसाइड। अमेरिका आस्ट्रेलिया के आदि -निवासियों (अबोरिजिंस ) के साथ वहाँ के आप्रवासी गोरों ने यही किया था। यह एक कामयाबअमानवीय समाजार्थिक फार्मूला है। बस्तर के आदिवासियों के उन्मूलन के संदर्भ मे यह इसलिए और भी भयावहहै क्योंकि इसमे उस शक्तिशाली हिंदू सवर्ण के तामाम हिस्सों की गुप्त और प्रछन्न सहमति शामिल है जिन्हे हमआधुनिक और मानवीय राजनीति की लफ्फाजी करते हुए अक्सर देखते हैं ।बहरहाल, जब हमारी आज की समकालीन हिन्दी कविता दिल्ली, भोपाल और दूसरी राजधानियो के कवियों कीमित्र मन्डलियो के उबाऊ और एक-दूसरे को उठाने-गिराने की लिजलिजी भाषाई बाजीगरी, महान होने औरमहान बनाने की संस्थाखोर जुगाडू तिकडम और विचारधाराओं की आड़ में हिंसक जातिवादी अभियानों मे बदलचुकी है...शाकिर अली की कविता विपदा मे घिरे हमारे समय के कमज़ोर और गरीब लोगो के जीवन के भयावहदृश्य प्रस्तुत करती है । १९७५ कें आपातकाल कें दौर मे इन्ही शाकिर अली का लेख छापने कें जुर्म मे पहल सम्पादक (हिंदी के अप्रतिम कथाकार - ज्ञानरंजन ) १९ महीने की लिए मीसा मे जेल जाते-जाते बचे थे । उस समय वह लेख लोकतंत्र की हिफाजत की पक्षमे था और अब यह कवितायेँ मनुष्यता और उसके जीवन के अधिकार और उसकी शांति-स्वतंत्रता के पक्ष में हैं । आप भी देखे कुछ कविताये :एनकाउन्टर डेढ़ सौ बचे बैगा जनजाति को बचाने के लिएडेढ़ करोड़ स्वीकृत किये गए हैं ,और डेढ़ हज़ार करोड़एनकाउन्टर के लिए रख दिए गए हैं ?स्कूल बंद है मोटरसाइकिल से स्कूल जाते गुरूजी कोकिसी ने आवाज दी - रुको !गुरूजी डर के मारे नहीं रुके ,पता नहीं जंगल में कौन रोक रहा है ?पीछे से गोली चली,गुरुजी खून से लथपथ गिर पडे थे,तभी से कोन्गुड का स्कूल बन्द है !!बहस आज बस्तर के हालात पर कोई कुछ नहीं बोलतान बस में न ट्रेन में ,न होटल में और न पान दूकान मे,सब चुप रहते हैं , डर के मारे !वैसे भीयुद्धभूमि में बहस नहीं चलती ,सिर्फ गोलियाँ चलती हैं।लम्बी लडाई ?शिक्षक सन्घ ने शिक्षा कर्मियो कीमौत पर शोक प्रगट करते हुए'लम्बी लडाई' की बात कही थीऔर,प्रशासन से उन्हे 'सुरक्षा' देने कीमान्ग की थी ।

Thursday, September 20, 2007

हर बुद्ध के साथ एक देवदत्त पैदा होता है, और हर गांधी के साथ एक गोडसे... लेकिन कुमारेन्द्र के साथ पैदा हुए थे अतुकांत।देवदत्त खुद को बुद्ध से बड़ा विचारक मानता था, गोडसे खुद को गांधी से बड़ा हिन्दू।इसी श्रृंखला में अतुकांत का दावा था कि वह कुमारेन्द्र से बड़ा कवि है।बुद्ध या गांधी अवतारी नहीं हुआ करते। जीवन की परिस्थितियां उन्हें बुद्ध या गांधी बना देती हैं। सिद्धार्थ जीवन का कटु यथार्थ न देखते, तो शायद बुद्ध न बनते; मोहनदास अंगरेजों द्वारा ट्रेन के डब्बे से फेंके न जाते तो ाायद मोहनदास ही रह जाते, महात्मा गांधी न बनते। लेकिन देवदत्त और गोडसे के साथ यह सब नहीं चलता। वे परिस्थितियों से जन्मे या उनके दास न होते-जन्मता महान् होते हैं-अवतारी पुरु ा।अतुकांत अवतारी पुरु ा ही थे। जन्म से ही कवि। अवतारी कवि। नाना प्रकार की कथाएं-परिकथाएं उनके बारे में प्रचलित थीं। बहुत कम उम्र में ही वे लिजैंन्ड बन चुके थे। जैसे तुलसीदास के बारे में किंवदंतियां हैं कि जन्म से ही उनके बत्तीसों दांत थे या कि जन्मते ही उन्होंने रामनाम का उच्चारण किया था और इसीलिए उनका पुकार नाम रामबोला हो गया-तो अतुकांत के बारे में भी ऐसे कई लटक-झटक थे। तुलसीदास की तरह दांत तो नहीं; लेकिन उनकी गझिन दाढ़ी के जन्म से ही उनके साथ हाने की बात कही जाती थी। और चूंकि रामनाम उच्चारने का युग नहीं था, इसलिए यह कहा जाता था कि प्रचलित प्राइमरी मनोहर पोथी की जगह निराला की प्रसिद्ध कविता 'राम की ाक्ति पूजा` से उन्होंने पढ़ाई की ाुरूआत की। यही उनका ककहरा था। कहते हैं इस कविता ाी र्ाक में विद्यमान ाक्ति को ही आधार बनाकर उनका नाम रखा गया ाक्तिकुमार। विद्यालय-महाविद्यालय के प्रमाण-पत्रों में उनका यही नाम आज भी है। अतुकांत तो उनका कविनाम था। कहते हैं उन्हें यह नाम प्रसिद्ध आलोचक रामविलास ार्मा ने दिया था।अतुकांत क्रांतिकारी कवि थे और केवल क्रांतिकारी कवि ही नहीं, अलग से क्रांतिकारी भी थे। उनका कहना था, जो क्रांतिकारी नहीं होते वे जीवन का यथार्थ समझ ही नहीं पाते। वे संस्कृत का एक लोक सुनाते थे जिसका भावार्थ था, जो बढ़िया ब्रह्मचारी नहीं होते, अर्थात् जिनका ब्रह्मचर्य ही डंवाडोल होता है, उनका गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास सब डंवाडोल होता है। इस लोक का इस्तेमाल वह अपनी इस उक्ति का पक्ष प्रस्तुत करने के लिए करते थे कि जो ढंग के क्रांतिकारी नहीं होते, उनका आगे का जीवन भी डंवाडोल होता हे।कहते हैं नक्सल आंदोलन में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। खुदीराम बोस की तरह कच्ची उमर में ही वह क्रांतिकारी बन गये थे बम-पटाखों के अनुभव भी सुनाते थे। नक्सवालदी आंदोलन सन् ६९ में ाुरू हुआ था, लेकिन वे सन् ६४ से ही उसके साथ थे। ईस्वी सन् की भूल पकड़े जाने पर उन्होंने स्प ट किया ६४ से ६९ तक वे आंदोलन की पीठिका तैयार करते रहे। आंदोलन के नामी-गिरामी नेताओं में कई थे, जिन्हें वे अपना शि य बतलाते थे। उनका कहना था क्रांति जब रास्ते से भटक गयी, तब से उससे अलग हो गये। आंदोलन के लोगों का कहना था क्रांति नहीं, कवि ही भटक गया था।इस क्रांतिकारी जीवन को वे होल-टाइमरी का जमाना कहते थे। इस जमाने में लिखी उनकी कविताओं का एक संकलन 'लाल सितारा` ाी र्ाक से प्रकाशित हो चुका था। नवजागरण प्रकाशन भोपाल से प्रकाशित इस संकलन में उनकी छप्पन कविताएं थीं। और ाायद यही कारण था कि ाहर में यह संकलन 'छप्पन छुरी` के नाम से चर्चित हुआ। उनके जीवन की ही तरह उनका संकलन भी लिजेन्ड बन गया था। कहा जाता था, इसकी कविताओं को पढ़कर कुछ लोगों को बुखार हो आया। एक पुलिस अफसर इसे पढ़कर पागल हो गया। जिस हॉल में इसका विमोचन हुआ, उसमें खुद-ब-खुद आग लग गयी। लड़कियों से जुड़े भी कुछ किस्से थे, जिसे सेंसर के कारण यहां देना मुनासिब नहीं होगा।जैसा कि उनका कहना था, चीन देश की यात्रा वह कर चुके थे। इस यात्रा के बारे में भी उनके दिलचस्प संस्मरण थे, जिसे वह विस्तार से लिख भी चुके थे। एक दैनिक में उनका यह वृत्तांत धारावाहिक छप चुका था। जैसा कि सब लोग जानते हैं, माओ-च-तुंग की मृत्यु १९७६ में हुई थी। और वह १९८० के बाद चीन गये थे। लेकिन उनका दावा था माओ से उनकी मुलाकात हुई थी। इस मुलाकात का दिलचस्प वर्णन उन्होंने अपने यात्रा-वृत्तांत में किया था। उनके अनुसार चीन के मौजूदा ाासकों ने अपने स्वार्थ में यह प्रचार कर रखा है कि माओ मर गये। मंयूरिया इलाके के एक गांव में माओ आज भी किसान का जीवन जी रहे हैं। इस स्थल तक वह बहुत मुश्किल से गये। देखा माओ मुर्गियों को दाना दे रहे हैं। कवि के जाने पर यथोचित स्वागत हुआ। माओ लाल सलाम को भूले नहीं हें। बांस के खूबसूरत मोढ़े पर उन्हें बैठाया गया। माओ ने इन्हें अपने हाथों से बनाया था। गांधी की तरह माओ भी कई हस्तकलाओं में पारंगत हें। बकरी की जगह वह मुर्गी पालते है। सबसे महत्व की बात थी कि माओ हिन्दी बोल रहे थे। हिन्दुस्तानी कम्युनिस्ट पार्टियों के नेता हिन्दी को भले ही हिकारत की नजर से देखते हैं, माओ हिन्दी प्रेमी हैं। और ऐसे-वैसे हिन्दी प्रेमी नहीं, 'राम की ाक्ति पूजा` जैसी क्लि ट कविता उन्हें जुबानी याद है। यहां के कम्युनिस्टों के पास न कोई सांस्कृतिक दृि टकोण है, न ाऊर। इन्हें माओ से सीखना चाहिए।ाऊर और तमीज कवि के प्रिय ाब्द थे। प्रिय से तात्पर्य यह कि इसका इस्तेमाल वह प्राय: करते थे फलाने को इस बात का भी ाऊर नहीं कि... या फिर, उसके पास भा ाा का काई तमीज नहीं है... या इसी राग में कुछ और। इन्हीं ाी र्ाकों से उनकी दो हाइकू कविताएं भी थीं। उनके लेखों में भी ये ाब्द बारंबार आते थे। लेकिन उनकी बातचीत में, एक ाब्द जो खूब आता था, वह था एथू। यह उनका तकिया कलाम था। इसलिए अंतरंग चर्चाओं में ाहर के साहित्यकार मजा लेने के लिए उन्हें कवि एथूदास कहते थे।कविता और क्रांति के अलावा अतुकांत के कई अन्य ागल भी थे। हिन्दी प्रचार, अनुसंधान, लोक संस्कृति आदि से उनका गहरा रिश्ता था।अंग्रेजी और अंगरेजी संस्कृति के वे परम विरोधी थे। लोहिया साहित्य के अध्ययन ने उनके अंग्रेजी विरोध को और गाढ़ा बना दिया था। लेकिन उनका अंग्रेजी ाराब से कोई विरोध नहीं था। उनके कमरे में और कुछ रहे, न रहे, एकाध बोतल अंग्रेजी ाराब अवश्य होती थी। ाराब में सोडा या पानी मिलाना अपनी ाान के खिलाफ समझते थे उन्हें नीट चाहिए होता था। कभी-कभी इस नीट में भांग घोल कर उसे और घनीभूत करते थे। यह उनका अपना प्रयोग था। उनका दावा था, पूरे जंबू द्वीप में कोई माई का लाल इसे नहीं पचा सकता। जब वह इसके ट्रांस में होते थे, तब उनसे कुछ सुनने का अपना ही मजा होता था।यह सब उस दौर की बात है जब नक्सलवादी आंदोलन अपने उफान पर था। कलकत्ता ाहर और बंगाल के केई ग्रामीण इलाके इसके प्रभाव में थे। दूसरे प्रांतों में भी इसका तेजी से फैलाव हो रहा था। सैकड़ों उत्साही नौजवानों को पुलिस ने बर्बरता पूर्वक मार डाला था। किसी भी किस्म के आंदोलनकारी को पुलिस झट से नक्सलवादी कह देती थी। जे.पी. तक के नक्सलवादी होने की बात कही जा रही थी। बंगाल, बिहार और आंध्र प्रदेश के अनेक हिस्से पुलिस छावनी बन चुके थे।ऐसे में क्रांतिकारी कवि अतुकांत अपनी कवितओं में लोक संस्कृति के रंग भरने लगे थे। मादा मन की भी कई कविताएं उन्होंने इन दिनों लिखी थीं। चिड़िया, फूल और बच्चे जेसे तत्व उनकी कविता के सरहद में अब तक नही थे। अब वे भी आने लगे। कवि ने इन्हें छुआ-सहलाया भी। अपना अलग व्यक्तिव उभारने के लिए वे प्राण-पण से जुट गऐ। मेहनत ने असर किया। कुछ नाजुक कवियों से उनकी मित्रता हुई। इस क्रांतिकारी कवि के विकास पर वे प्रसन्न थे।लेकिन इस प्रक्रिया में उनके पुराने मित्र छिटक गये। जिस नयी जमीन पर वह खड़े थे, वह उनके लिए अनजानी-परायी थी। कुछ मित्र मिल जाना और बात है, हकीकत यह थी कि अतुकांत इस दुनिया के लिए प्रवासी पक्षी ही बन सके। इस हिस्से के कवियों ने उन्हें हमेशा विजातीय नजरिये से ही देखा। नतीजा हुआ कि उनके लिखने पर पाला पड़ गया। एक-एक कविता पर महीनों काम करते और जब उसे किसी पत्रिका को भेजते तो वह वैसे ही लौट आती जैसे आईने से परावर्तित होकर कोई किरण। उनका जी उचट गया। अवसाद के इन्हीं क्षणों में उन्होंने लिखा- 'हम तो दोनों ठिकानों से गये।`ये वही दिन थे जब रामविलास ार्मा आलोचना से विमुख होकर इतिहास से अभिमुख हुए थे। अतुकांत को भी लगा, वाकई इतिहास हारे हुओं के लिए हरनाम है। सुकून वहीं मिल सकता है। इतिहास का अर्किडिया उन्हें भी आकि र्ात करने लगा। कविताओं से मुक्त हो वे इतिहास की ारण में आ गये। यहां पत्र-संपर्क और परिचय कोई मदद नहीं कर सकता था। जम कर पढ़ बिना यहां कुछ चलने वाला नहीं था। अतुकांत जी पढ़ाई पर एक बार फिर जमे। जो भी मिला-जैसा भी मिला धंुआधार पढ़ाई की। मन लगने लगा। कविता तो कोई भी कर सकता है। लेकिन इतिहास की साधना। सबसे संभव है क्या? कदापी नहीं। अब जाकर उन्हें लगा कि इतिहास के संधान के बिना उनका जीवन अधूरा था। इसके बिना तो ढंग से कविता भी नहीं लिखी जा सकती। व र्ाों उन्होंने इतिहास को ओढ़ना-बिछौना बनाये रखा। भाजपाईयों की तरह उनका भी मानना था कि इतिहास को एकपक्षीय नहीं होना चाहिए। इस नजरिये को लेकर रामविला ार्मा जहां मोटे-मोटे ग्रंथ लिख रहे थे, वहां वे पुस्तिकाएं लिख रहे थे। दर्जन भर से अधिक उनकी पुस्तिकाएं छप चुकी थीं। उनका मानना था क्रांति किताबों से नहीं इन कितबियों से होगी।इन फुटकर लेखन के साथ उनका एक ाोधपरक ग्रंथ 'कवि कुंभनदास` भी प्रकाशित हुआ। यह ग्रंथ लिख कर एक तरह से वह अपने पूर्वजों के ऋण से मुक्त हुए थे। उनका दावा था कि कुंभनदास उनके पूर्वज थे। उनकी पच्चीसवीं पीढ़ी में वे स्वयं को रखते थे। खुद को उनकी ही तरह खुद्दार बनाये रखने में उनका बहुत नुकसान हो चुका था। लेकिन कुल की परंपरा बनाये रखना उनके लिए महत्त्वपूर्ण था। अपनी ताजा कृति जब उन्होंने कवि कुंभनदास को समर्पित की थी, तब लोगों को अटपटा लगा था। लेकिन जल्दी ही यह बात ाहर में फैल गयी कि कवि अतुकांत कुंभनदास के वंशज हैं। इस चर्चा से उन्हें फायदा ही हुआ। कुंभनदास कॉलेज में उन्हें व्याख्याता का स्थायी पद मिल गया। वे साहित्य के अध्यापक हो गये। अच्छी तनख्वाह मिलने लगी। उन्होंने अपने एक मित्र को लिखा- 'जिन्दगी अब स्थायित्व ले रही है। अब साहित्य का काम निश्चिंत होकर कर सकूंगा। इसे नयी जिन्दगी की शुरूआत ही कहिये।`नयी जिन्दगी की इसी शुरूआत में उनकी कविताओं का दूसरा सकंलन प्रकाशित हुआ। 'उपरांत` शीर्षक इस संकलन में उनकी वे कविताएं थीं, जो क्रांतिकारी दौर के बाद लिखी गई थीं। कोमल प्रकाशन ने इसे सुरूचिपूर्ण ढंग से प्रकाशित किया था। कवि का पत्र-संपर्क अब तक अच्छा-खासा हो चुका था। इस संपर्क का उन्होंने भरपूर इस्तेमाल किया। चारों तरफ समीक्षाएं छपीं। लेकिन कविजी का भाग्य। कवियों के समाज में उन्हें कोई खास जगह नहीं मिल सकी। 'इतिहास में कुछ समय के लिए जो भटक गया था, उसी का खामियाजा भुगत रहा हूं और कुछ नहीं। जल्दी ही सब ठीक कर लूंगा। उन्होंने अपना इरादा पक्का किया। कमर कसी। कठिन परिश्रम कर अपने अंदाज में कुछ धांसू कविताएं लिखीं। कई तरह के पापड़ बेल कर कुछ धांसू पत्रिकाओं में छपवायीं भी। लेकिन फिर कोई नोटिस नहीं....कविजी कौंच कर रह गये।साहित्य के वातावरण को उन्होंने जम कर कोसा। 'साहित्य में प्रदूषण` शीर्षक से एक साहित्यिक मासिक मेंे लेख भी लिखा। किसी चीज का कोई असर नहींं। लेकिन कविजी ने हार नहीं मानी। इन्हीं दिनों उनका संपर्क 'कंवल` पत्रिका के नामी संपादक और भूतपूर्व कवि चिनगारी जी से हुआ। संपर्क के कुछ ही समय बाद दोनों को एक दूसरे के कवि कुंभनदास के खानदान से जुड़े होने की जानकारी हुई। इस जानकारी ने संपर्क को प्रगाढ़ बना दिया। चिनगारी जी अतुकांत से वय में कोई दस साल बड़े थे। लकिन बड़प्पन का परिचय दिया अतुकांतजी ने। चिनगारी जी को भईया कहना शुरु किया। चिनगारी जी के नाम उनके पत्रों की शुरुआत पहले प्रिय चिनगारी जी से हाती थी, अब हाने लगी पूज्य भइया से। पूज्य भइया ने अपनी पत्रिका का एक विशेषांक अतुकांत पर निकाल। कई आलेख उनकी कविताओंे पर लिखवाये गये। लेकिन साहित्य की दुनिया ऐसी असंवेदनशील कि विशेषांक की कोई खास नोटिस नहीं ली गई। कहने वालों ने कहा उसे कूड़ेदान में भी जगह नहीं मिली।साहित्य के इसी असंवदेनशील आचरण ने कवि अतुकांत को देखदत्त बना डाला। जिस कुमारेन्द्र को संस्कृति की कोई समझदारी नहीं, जो कभी साहित्य का विद्यार्थी नहीं रहा, जिसके वंश में दूर-दूर तक कोई ककहरा जानने वाला नहीं, जिसे पहनने-ओढ़ने, उठने-बैठने, बोलने-बतियाने का शऊर नहीं, उसे कुमारेन्द्र की इतनी चर्चा। इतनी प्रतिष्ठा। और कविकुल शिरोमणि कुंभनदास के वंशधर, साहित्य के परम ज्ञाता, महान् आलोचक रामविलास जी के परम प्रिय, नक्सल मूवमेंट के होलटाइमर कवि अतुकांत की कोई नोटिस नहीं, तो इसका साफ मतलब है आज का साहित्य मीडियाकारों, लंपटों, अज्ञानियों और अकुलीनों द्वारा पोषित और इसलिए प्रदूषित है। ऐसे साहित्य पर थू करने के अलावा वह और क्या कर सकता है। अपनी प्रतिक्रिया के सिलसिले में कवि नागार्जुन की इन पंक्तियों को भी अपने अभिप्राय के साथ नत्थी किया-'साहित्य तेरा बुरा हो, काट लूं गला यदि हाथ में छुरा हो।`साहित्य का गला तो वह नहीं काट सकेे, एक बार अपना ही गला काटने अर्थात् आत्महत्या करने की कोशिश उन्होंने जरूर की किन्तु इसमें भी वे फिल रहे।। इस घटना ने उन्हें कुछ समय के लिए तोड़ कर रख दिया। हुआ यह कि आत्महत्या के प्रयास की खबर शहर के सबसे अधिक बिकने वाले दैनिक के तीसरे यानी नगर पृष्ठ पर एक कॉलम में बस 'इतना`-सा प्रकाशित हुआ। यानी उनकी हत्या-आत्महत्या की खबर भी, इस शहर इस समाज के लिए कोई अर्थ नहीं रखती? यदि वह मर जाता, तो क्या यह समाचार तीसरे पृष्ठ पर ही-और वह सिर्फ एक कॉलम में, उतना-सा ही प्रकाशित होता। इतना निरर्थक प्राणी है वह। उसकी साहित्यिक सेवाओं का बस यही मूल्य है। ज़रा स्थिर होकर उन्होंने अपनी डायरी में विस्तार से अपनी पीड़ा दर्ज की-'जिस पैशाचिक समाज ने निराला और रामविलास जी की कोई इज्जत कोई परवाह नहीं की, उससे कोई आशा, कोई उम्मीद रखना मूर्खता के सिवा कुछ नहीं है।` कवि ने एक लंबी कविता में इन भावों को अभिव्यक्ति दी। अनेक पत्रिकाओं से लौटकर जब कविता आई, तब उस पर अद्यतन तारीख डालकर एक मार्मिक पत्र के साथ चिनगारी जी को भेजा। 'कंवल` के अगले ही अंक में संपादकीय टिप्पणी के साथ कविता प्रकाशित हुई। कवि के पास कुछ आत्मीय पत्र आये। जीने की आश्वस्ति मिली। चिनगारी भइया के रहते वह कैसे कह सकता है कि साहित्य में उसके लिए जगह नहीं है। अनेक कवि-लेखक ऐसे हुए हैं, जिनके महत्व को उनके जीवन में नही समझा गया। शायद वह ऐसा ही कवि है। भविष्य की महाकवि।वह धीरे-धीरे संतुलित हो रहे थे। इसी तरह चल रहा होता, तो संभवत: वह जल्दी ही सामान्य भी हो जाते। लेकिन फिर एक 'दुर्घटना` हुई। कुमारेन्द्र को इन्हीं दिनों साहित्य का एक प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल गया। और वह भी किस संकलन पर! जिसका ब्लर्ब लिखाने के लिए कुमारेन्द्र कोई दस दफा आया होगा। आखिर वह क्या करता। लिखना पड़ा उसे शंकर की तरह वह भावनाओं का शिकर हो जाता है। और नहीं तो क्या। ब्लर्ब ही इतना प्रभावशाली था कि पुरस्कार चयन समिति के लोग प्रभावित हो गये होंगे। पूरा संकलन पढ़ने की फुर्सत किसे रहती है। फिर कुमारेन्द्र के जुगाड़ का क्या कहना। राजनैतिक संपर्क भी उसके कम हैं क्या। निश्चय ही राजनैतिक दखलअंदाजी भी हुई होगी। साहित्य का प्रदूषण यूं ही तो नहीं बना हुआ है।बड़ी मुश्किल से उन्होंने ज्लां पॉल सार्त्र की एक तस्वीर कहीं से जुटायी। इन दिनों यह तस्वीर उन्हें बेहद प्रिय थी। उन्होंने अपने कमरे में इसे ऐसी जगह लगाया था, जिससे यह आसानी से दिख सके। आने वालों से कहते, लेखक यह है..नोबेल पुरस्कार मिला और इसने लतिया दिया। लेखक ने पुरस्कार की हैसियत बता दी। इसको लेखक कहते हैं। पुरस्कार की नाव पर साहित्य की यात्रा करते हैं, वे और लोग होते हैं।यही सब बड़बड़ाते, बतियाते उन्होंने स्वयं को ऐसा बना लिया कि शहर में यह खबर फैल गई कि अतुकांत जी एक बार फिर अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं। इस बार वे कुछ अधिक ही असामान्य थे। इसका पता इससे चला कि जिस अंग्रेजी से वह नफरत करते थे, उसका इस्तेमाल इन दिनों कुछ ज्यादा करने लगे थे। इन दिनों इसी में वह सामान्य पत्राचार भी करते थे।कुंभनदास कॉलेज के पिं्रसिपल ने उनकी अस्वस्थता को गंभीरता से लिया। कवि कुंभनदास के वंशधर कवि अतुकांत कॉलेज की शोभा हैं। इनकी सेवा पाकर कॉलेज कृतार्थ हुआ है। कॉलेज का परम धर्म है कि वह कवि के इलाज की समुचित व्यवस्था करे। मेधावियों को मानसिक बीमारी होती रहती है। राहुलजी जैसा महापंडित भी मानसिक व्याधि से ग्रस्त होना ही यह सिद्ध करता है कि वे परम मेधावी है। हम उन्हें ऐसे ही कैसे छोड़ सकते हैं।शहर के सबसे बड़े मनोरोग चिकित्सक डाक्टर पिपलानी थे, जिन्होंने उस पुलिस अधिकारी का इलाज किया था, जो अतुकांत की कविताओं को पढ़ कर असामान्य हो गया था। तो यह रहा खुराफ़ाती कवि। डाक्टर मुस्कुराये। तीन दिनों तक गहन जांच चलती रही। इस बीच पाया गया कि कवि की आंखें कुछ ज्यादा तनीं हैं। चेहरे पर भी भयानक तनाव तिरा होता था। डॉक्टर ने कवि की स्थिति को चिन्ताजनक बतलाया।बीमारी का हाल जान चिनगारी जी दौड़े आये। उनके आने से शहर के तमाम रचनाकारों में कवि के प्रति भावना उमड़ी। चिनगारी जी ने बाजाप्ता प्रेस-कांफ्रेंस कर अतुकांत की विक्षिप्तता की तुलना निराला की विक्षिप्तता से की।फिर तो बयानों और गोष्ठियों का तांता लग गया। अखबारों में लेख और संपादकीय लिखे जाने लगे। गवर्नर और मुख्यमंत्री अतुकांत जी से मिलने आये। सरकारी सहायता की पेशकश की गयी। साहित्य का मनीषी विक्षिप्त हो रहा है, इसका अर्थ है हमारा सांस्कृतिक संकट गहरा है।इन दिनों उनकी कविताएं भी चर्चा में आयीं। उत्साही नौजवानों के सांस्कृतिक दल ने उनकी कविताओं के पोस्टर बनवाये। इन पोस्टरों की जगह-जगह प्रदर्शनियां लगीं। 'लाल सितारा` और 'उपरांत` की प्रतियां भी बिकीं। उनके संपूर्ण साहित्य परा शोध करने के लिए यूनिवर्सिटी की एक छात्रा ने निबंधन करवाया। फिलहाल कुमारेन्द्र काफी पीछे छूट चुके थे। साहित्याकश में अतुकांत जी भोर के तारे की तरह सुर्ख जमे हुए थे। क्षितिज पर केवल वह थे, दूर-दूर तक दूसरा कोई नहीं था।जब सारी दुनिया अतुकांत जी के लिए हाय-हाय कर रही थी, तब वे इत्मीनान से अपनी डायरी लिख रहे थे और इसी क्रम में एक रोज उन्होंने लिखा-'पहली बार जीवन में जीत हासिल हुई है। कुमारेन्द्र के पुरस्कार पाने के